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जीवन गीता श्लोक हो

घर आँगन में दीप  जला लो ,ह्रदय में आलोक हो  उजियारे से प्रीत लगा लो , मन  निर्भय अ शोक हो  जग जननी माँ दुर्गा लक्ष्मी ,देती यश धन बल है  गुणों से पूजित हो जाते ,गुण  बिन सब निष्फल है गुण  को पा लो स्वप्न सजा लो ,धरा स्वर्ग का लोक हो  ज्योति से होता उजियारा, ज्योतिर्मय जगदीश है  ज्योतिर्मय जग मग आशाये ,ज्योति का आशीष है  चमक दमक दीपो की ज्योति ,जीवन गीता श्लोक हो

दीवाली के दीप जले है, दीपो का त्यौहार है

दीवाली के दीप  जले है, दीपो का त्यौहार है  मिली रोशनी अंधियारे को ,खुशियो की बौछार है  मिटटी से बन जाता सब कुछ, माटी करती  प्यार है  मिटटी के दीपक कर देते ,धरती का श्रृंगार है  मिटटी से ही शिल्प ढला  है ,शिल्पी का  औजार है  गौरी की छम छम पायलिया , बैलो के बजते घुँघरू  रंगो से सजती दीवारे ,मस्ती की डम डम  डमरू  दीपक सा जग -मग हो तन मन रोशन हर दीवार है  कर्मो का यह दीप  पर्व है, करम धरम का मर्म है  शुभ कर्मों  का सुफल होगा ,नीच कर्म से शर्म है  बिना कर्म के आज नहीं है ,सपने हो बेकार है

दिवाली है

अमीर हो या गरीब  उजला धन हो तो दिवाली है  जन निर्धन हो या सम्पन्न  मन प्रसन्न हो तो दिवाली है  ब्लैक मनी नहीं है हनी  व्यवस्था भ्रष्ट हो तो जिंदगी काली है  प्रशासन सख्त हो  कामकाज में  व्यस्त हो तो दिवाली है  जीवन हरा भरा हो  अपराधी  डरा  डरा  हो तो दिवाली है  सेवा  ही धाम हो  भक्ति निष्काम हो तो खुशहाली है  धड़कन में राम हो  मन में विश्राम हो तो दिवाली है