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वेद की भुले ॠचाये

रिश्ते भी तो रिस रहे है , रिक्त होते जा रहे है गिद्ध नोंचे है घ्रणा के , घाव भी गहरा रहे है बढ रही है खाईया है सम्वाद सेतु ढा रहे है स्वर ठहरे द्वेष के ही सदभाव घटते जा रहे है वे अा रहे कही जा रहे उर स्पर्श न कर पा रहे है निष्ठुरता रहती ह्रदय मे ह्रदय को तरसा रहे है दूरिया बढती परस्पर परछाई बन पछता रहे है हर तरफ रूसवाईया है रूबाईयो को गा रहे है वेद की भुले ॠ चाये अब वे नचाये जा रहे है इतरा रहे गीत गा रहे घट छलछलाते जा रहे है ज्ञेय अौर अज्ञेय हेतु से सताये जा रहे है मूल्य बढते है अकारण कारण गिनाये जा रहे है तंत्र मारण अौर जारण से निवारण पा रहे है धर्म धारण कर रहे है कर्म से घबरा रहे है

भावो का दीप

रूप तेरा अाज है, कल ढल जायेगा तेरी मुठ्ठि से पल पल ,फिसल जायेगा तू कंचन काया को ,सम्हाल कर रखना अाईना तेरे रूप को ,निगल जायेगा दुर्भाग्य की लकीरे , बहुतेरो को रुलाती है कर्म की दीपिका , सौभाग्य को बुलाती है हे!मनुज परमार्थ कर , निस्वार्थ से पुरुषार्थ कर पुरुषार्थ से तकदीरे है , प्रारब्ध को हिलाती है रूप दीप शिखा मे ,जल जाता परवाना है प्रीत की दीप्ति मे ,मिट जाता दिवाना है भावो का दीप ,सबसे समीप होता है भावनाअो से जुडा, परवाना है दिवाना है

स्नेह

स्नेह जब ममत्व का रूप धारण करता है तो ममता कहलाता है स्नेह जब दया अौर अार्द्रता सौहार्द्रता का रूप धारण करता है तो करूणा कहलाता है स्नेह को जब पित्रत्व का अाकाश मिलता है तो अाश्रयदाता बन जाता है स्नेह को जब सम्वेदना का अाभास मिलता है तो गीत गजल साहित्यिक अाचार कालजयी विचार बन जाता है स्नेह किसी अजनबी से हो जाता है तो प्रीत प्यार बन जाता है ऐेसे प्रेम से व्यक्तित्व का निखार पा जाता है राधा से श्रीक्रष्ण से स्नेह अध्यात्मिक ऊॅचाईया पा जाता है माता के स्नेहिल स्पर्श पाकर शिशु अाहार दुलार पा जाता है पिता का स्नेहाशीष पाकर पुत्र सारा संसार पा जाता है बुजुर्गो की स्नेहिल स्पर्श की हौसलो को उडान प्रदान करता है इसलिये स्नेह के अलग - अलग भाव है स्नेह सिर्फ स्नेह नही अात्मा का अात्मा से लगाव है स्नेह शून्य जीवन मे अभाव ही अभाव है जहाॅ स्नेह है वहा समभाव है स्नेह विहीन समबन्धो रहता नही सदभाव है स्नेह के कई रूप है स्नेह की कही छाॅव है तो कही धूप है स्नेह कही बोलता है तो कानो मे मिश्री घोलता है स्नेह कही चुप - चुप रहता है संकेतो अौर अनुभूतियो अाॅखो से साॅसो से बोलता है मौन स्नेह

खिले रूप बन चाँद

रोशन मत कर रोशनी ,रोशन कर दे तम दीप पर्व दीपावली ,मन का  हर ले गम हाथ पैर है फ़ूल रहे ,फ़ूल रहे है गाल काया भी निर्लज्ज हुई ,नग्न देह विकराल भावो की भावांजलि ,मन मोहता तव रूप खिली -खिली हो चांदनी ,खिली -खिली हो धूप रूप चौदस में रूप भरा ,खिले रूप बन चाँद यम -नियम से रूप सजा ,संयम के बन्ध बाँध   दीप पर्व है देत रहा , तन - मन मे उल्लास चिंतन पावन बना रहे , जीवन हो मधुमास नारायण की क्रपा रहे , लक्ष्मी का वरदान सदा करु माॅ शारदे , तेरा ही गुणगान ​​​​​​​​​​​

दीवाली पर दीप कहे

दीपो में है दीप रहे ,मोती रहते सीप दीवाली पर दीप कहे ,मन का आँगन लीप रंगों की रंगावली , रंग बिरंगे दिन दीपो की दीपावली ,नभ तारे अनगिन तारे प्यारे चमक रहे ,चमकी हर दीवार दीपो से हुई दीप्त धरा ,तिमिर हटा हर बार नेह तरल में दीप जले ,बिखरी स्नेहिल गंध सत्य सनातन बने रहे ,रचे गद्य और छंद रिश्तो का इतिहास रहा ,रिश्तो का भूगोल रिश्तो में मधुमास रहा ,रिश्ते है अनमोल