वो नही संशय मे भय में
रहता वो तो हृदय में
वो तिमिर को दीप देता
है समीर का वो प्रणेता
प्राची मे उषा रहा है
वो रहा सृजन प्रलय में
धैर्य को खोता नही है
वो कभी सोता नही है
बह रहा है वह समय में
और प्राची में रहता उदय में
वो कोई गिनती नहीं है
वो कोई विनती नहीं है
वो रहा पुरुषार्थ कर्म
अर्चना संगीत लय में
चाहता उसको धरू में
जाप कर उस पर मरू में
बारिशों में बूँद जैसा
वो कामना में न विषय में