बुधवार, 9 सितंबर 2026

कामनाएँ है विदेशी

जागती है ये सुबह 
सो गई है रात ऐसी 
पीठ पीछे दोगले है 
सामने बनते हितैषी 
हौसले अब थक चुके हैं 
स्वाद दुख के चख चुके है 
जग यहा होता न अपना 
कामनाए है विदेशी

शनिवार, 22 अगस्त 2026

ज़िंदगी का कल रही

थोडी थोड़ी गल रही है 
 थोड़ी थोड़ी जल रही है 
है पुरानी वेदनाये  
गीत में जो ढल रही है 
जो हमारे हित में थीं 
जो तुम्हारी प्रीत में थी 
बात ऐसी तुम बताओ  
बात ऐसी हम बताये 
वो तुम्हारी और हमारी 
ज़िंदगी का कल रही है 

बुधवार, 12 अगस्त 2026

अर्चना संगीत लय में


वो नही संशय मे  भय में 
रहता  वो  तो  हृदय में 

वो तिमिर को दीप देता
 है समीर का वो प्रणेता 
प्राची मे उषा रहा  है 
वो रहा सृजन प्रलय में

धैर्य को खोता नही  है 
वो कभी सोता नही  है 
बह रहा है वह समय में
और प्राची में रहता उदय में

वो  कोई  गिनती  नहीं  है  
वो  कोई  विनती  नहीं  है 
वो  रहा  पुरुषार्थ  कर्म 
अर्चना  संगीत लय  में 

चाहता  उसको  धरू में 
जाप कर  उस  पर  मरू  में 
बारिशों  में  बूँद  जैसा 
वो  कामना  में  न  विषय  में 


वातावरण का साथ दे


 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

और सपने थे बिखरने

झर रहा बारिश का मौसम 
कर रहे श्रृंगार झरने 
चल पड़े बादल यहा पे 
सिंधु से जल को है भरने
 न रही मासूम कलियां 
जब रहा संसार छलिया
 रह गई केवल घटाए 
और सपने  थे बिखरने

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

नर्म कोमल सी हथेली

झर गई बारिश से कलियाँ 
पत्तिया बूँदों  ने धोई 
है यहा अधरों पे खुशियां 
क्या कर गया श्रृंगार कोई 
डालियों  पर फूल अटके 
शूल भी आँखों को खटके 
नर्म कोमल सी हथेली 
टहनियो को यहा चुभोई

बुधवार, 15 जुलाई 2026

हँसते हँसते मिट जाते हैं



अब भाव नही होते दर्पण 
जो आँखो से दिख जाते है 
न रही चेतना चिन्गारी 
अब कलमकार बिक जाते है 
कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा 
तलवे सत्ता के चाट रहा 
जो लिख रहे हैं चिन्गारी 
हँसते हँसते मिट जाते हैं

कामनाएँ है विदेशी

जागती है ये सुबह  सो गई है रात ऐसी  पीठ पीछे दोगले है  सामने बनते हितैषी  हौसले अब थक चुके हैं  स्वाद दुख के चख चुके है ...