शनिवार, 8 अगस्त 2026

और सपने थे बिखरने

झर रहा बारिश का मौसम 
कर रहे श्रृंगार झरने 
चल पड़े बादल यहा पे 
सिंधु से जल को है भरने
 न रही मासूम कलियां 
जब रहा संसार छलिया
 रह गई केवल घटाए 
और सपने  थे बिखरने

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

नर्म कोमल सी हथेली

झर गई बारिश से कलियाँ 
पत्तिया बूँदों  ने धोई 
है यहा अधरों पे खुशियां 
क्या कर गया श्रृंगार कोई 
डालियों  पर फूल अटके 
शूल भी आँखों को खटके 
नर्म कोमल सी हथेली 
टहनियो को यहा चुभोई

बुधवार, 15 जुलाई 2026

हँसते हँसते मिट जाते हैं



अब भाव नही होते दर्पण 
जो आँखो से दिख जाते है 
न रही चेतना चिन्गारी 
अब कलमकार बिक जाते है 
कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा 
तलवे सत्ता के चाट रहा 
जो लिख रहे हैं चिन्गारी 
हँसते हँसते मिट जाते हैं

सोमवार, 13 जुलाई 2026

भाव है संवेदना है

मूर्तियां  पत्थर  नहीं  है  
मूर्तियों  में  चेतना  है 
मूर्तियां  हैं  प्राण  वाहक 
सन्देश  ईश को  भेजना  है
शिल्पियों  की  ये  कहानी 
मूर्तियाँ  होती  पुरानी 
 मूर्तियां  सृजन  की  पूजन 
भाव  है  संवेदना  है 
मूर्तियां  जगती  रही  है 
मूर्तियां  सोती  रही  है 
मूर्त  होती कल्पना  तो 
सृजना की  वेदना  है 
मूर्तियाँ  कोमल  रही  है 
मूर्तियां  हलचल  रही  है 
मूर्तियां  दिखती  दिवारें 
मूर्तियां  निश्चल  रही  है 
मूर्तियां  से  बात  करके 
लक्ष्य  पावन  भेदना  है 

होता वह पिता है

खुद ही से है हारा
खुद ही से जीता है 
लड़ा युध्द जिसने 
बना विजेता है।
मरा है जिया है 
सभी कुछ किया है 
शिकायत न करता
वह होता पिता है 

शनिवार, 11 जुलाई 2026

सौन्दर्य नहीं था जीवन में

उनके वो आंसु पोंछ रहा
जिनकी पीडा मे पानी था 
जो दर्द बसा था सीने 
वो दुख की ही राजधानी था 
खाली खाली सा लगता था 
वो हरियाली सा दिखता था 
सौंदर्य नही था जीवन में 
तन मन की होती हानि था 

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

देखा दुखियों का क्रंदन है


यह कैसा होता बंधन हैं 
ये होता कैसा नन्दन है 

ये भाव अनोखे भरे भरे 
ये रिश्ते होते खरे खरे 
शब्दों के मोती झरे झरे 
इन आँखो में अभिनन्दन है 
हृदय से निकला वंदन है 

 ये मोर पंख की सुंदरता
 इस नभ से अमृत है बटता 
जीवन से रस न हैं घटता 
यहां समरसता का चंदन  है 
देखा दुखियो का  क्रंदन  है 

जिन  आँखों  में  है  प्यार  रहा 
उन  आँखों  में  आभार  रहा 
सबको  ईश्वर है  तार  रहा 
प्राणों  से  उसके  तार  जुड़े  
ये  प्राणों  का  स्पन्दन  है 


और सपने थे बिखरने

झर रहा बारिश का मौसम  कर रहे श्रृंगार झरने  चल पड़े बादल यहा पे  सिंधु से जल को है भरने  न रही मासूम कलियां  जब रहा संसार छलिया  रह गई केवल ...