शुक्रवार, 15 मई 2026

पर कुछ न कुछ तो लोच है

अब  यहां  उत्तर  भटकते 
 और  खटकती सोच  है 
पंख  फैले  पंछीयो  के 
 दिख  रही  यहां  चोंच  है 

अब  हमें  परछाईयों  
गहराइयों  को  जानना  है 
रास्ते  में क्यों उखड़ती
 हर  श्वास  को  पहचानना  है 
प्रश्न  शाश्वत  है पुराने  
पर  नवीनतम  खोज  है 


हो गई  भयभीत  लताएँ 
चिड़िया  न  गीत  गाए 
चिट्ठियां न आई  है अब 
 दिल की बाते जो बताए 
न कभी  स्वीकारते  वे  
पर  कुछ न कुछ तो लोच  है 

शुक्रवार, 8 मई 2026

ठहरी हुई टहनी है


व्यथा  की  कथायें 
 बहुत  कुछ  कहनी है 
ठहरे  हुये  पल 
 ठहरी  हुई    टहनी है
क्रीड़ा  में  पीड़ा  है
  पीड़ा  में  क्रीड़ा  है 
मौसम  की  गर्मी  ही
  आज हमें  सहनी  है 

मंगलवार, 5 मई 2026

तो कभी वह घी रहे हैं


वे कभी अमृत रहे हैं
 तो कभी वह घी रहे हैं 
जब कथायें न सुहाती 
तो व्यथा को जी रहे है 
है. जहां से सूर आया 
गीत और संगीत पाया
 गीत और संगीत सरगम 
ज़ख्म हर गम सी रहे है

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

दिख रही कहीं आत्मा

खो  गए  तारे  वो  सारे 
खो  गया  कहीं  चंद्रमा 
दिख  रहे  सुन्दर  नज़ारे 
चोटियों  पर  हिम जमा

है प्रभा की रश्मियां  ये 
प्राची  से  है  झाँकती 
पंछीयो की  टोलियाँ  है 
दूर  गगन  को  नापती
जो  अमावस  कर  न  पाई 
कर  रही  वो  पूर्णिमा

जंगलों  में  अंचलों  में 
कुछ  हिरण  दल झूमते  
अब  कहीं  नवगीत  को  है 
मंत्रवत  वो  सुनते  
पेड़  पर्वत  खाइयों में 
दिख  रही  कोई  आत्मा 



है  यहां  कुछ  औस बूंदे 
 बादलों  से  वे  न  बरसे 
त्रस्त  होती  ये  धरा  है 
कंठ  तरसे  होंठ  तरसे 
दूर  गए  मौसम  यहां  से 
हो  गया  अब  खात्मा 





शनिवार, 25 अप्रैल 2026

टूटा है क्यों भाई


रोती  हुई  भावुकता  
ठहरी  हुई  गहराई  
पर्वत को  चीर  कर  ये 
नदिया  एक  बह आई 
साहित्यिक  सृजन  है  
कर्मों  का  पूजन  है
अपनों  से  रूठा क्यों  
टूटा  है  क्यों  भाई 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

जब चेतना होती मीरा है


दीप देता  रोशनी  तो 
यामिनी  से  तम घिरा  है 
रेत  बनती है किनारे 
गहराई  बनता हीरा  है 
दुख  देती  जिंदगी  तो 
सुख  देती  जिंदगी 
ईश तो  मिलते  तभी  है 
जब  चेतना  होती  मीरा  है

 

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

राह से जीवन बना रे



चाह  में  है  राह  रहती 
राह  में  सुन्दर  नजारे
राह  में  मुश्किल  रही  है 
 राह  में  झिलमिल  सितारे 
राह  में  कंकड  है  पत्थर 
 राह  में  सोये  न  थककर 
राह  से  होकर  मिले  हैं  
चोटियां  उत्कर्ष  प्यारे 
राह  कुछ  गाती  रही  है  
राह  तो  साथी  रही  है 
राह  में  अनुभूतियां  है 
 राह  से  जीवन  बना  रे


पर कुछ न कुछ तो लोच है

अब  यहां  उत्तर  भटकते   और  खटकती सोच  है  पंख  फैले  पंछीयो  के   दिख  रही  यहां  चोंच  है  अब  हमें  परछाईयों   गहराइयों  को  जानना  है  ...