बुधवार, 31 अगस्त 2022

खींची नई लकीर

गणपत  है  विराज  रहे  , साध  रहे  सब  काज 
पग  प्रतिपल  गतिमान  रहे ,पद  कीर्ति  सर  ताज 
पर्वत तो  कैलाश  रहा, गण  के  पति  गणेश 
जीवन  में  शुभ  कृत्य  करे,  सुमति दे  महेश 
मतिमंदो  साथ  नहीं, जीवन  के  आयाम 
गणपति का है राज जहा ,हुए सभी शुभ  काम 
मित भाषी  को  राज मिला,  मुँहफट रहा  फकीर 
जो  अपनी नई राह  चला ,  खिंची नई  लकीर 

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

स्वर्ण से अब तक खरे है

पेड़ से पत्ते झरे है

फूल से रस्ते भरे है

सरसराती झाड़ियां है

आ रही कुछ गाड़ियां है

तोड़ते ख़ामोशियों को

झुण्ड में झुरमुट खड़े है

अंतहीन यहा दूरीया है

सैकड़ों मजबूरियां है

पीठ पर्वत है टिकाये

गगन तक गिरीवर चढ़े है

कोई सरगम गा रहा हैं

एक फरिश्ता आ रहा है

ख्वाहिशों के काफिले है

ख्वाब न अब तक मरे है

भेद वो मन का न खोले

मन ही मन सबको वो तोले

वे हिमालय के हैं योगी

स्वर्ण से अब तक खरे है

रविवार, 24 जुलाई 2022

पेड़ पर और कौन ठहरा

पेड़  पर रहते  है पंछी 
पेड़  पर और  कौन  ठहरा  

चाहे  जैसा  घर  बना  लो 
पेड़ पर  कुटिया  बना  लो  
खिलखिलाये  जिंदगी  भी 
य़ह  धरातल  हो  हरा 

पेड़  की  हम  गोद  खेले 
पेड़  से  सब  कुछ  संजो  ले 
पेड़  की  छाया  में  निंदिया 
लथ पथ  पसीने  से  भरा 

पत्तियाँ  भी  सरसराती 
चिड़िया  रानी  बुदबुदाती 
पेड़  की  भाषायें  बोले 
प्रेम की  हो  य़ह  धरा

शनिवार, 15 जनवरी 2022

कोई चीन चीज

चीनी से हम छले गये ,घटना है प्राचीन
ची ची करके चले गए, नेता जी फिर चीन
सीमा पर है देश लड़ा ,किच किच होती रोज
हम करते व्यापार रहे, पलती उनकी फौज
 अब तक तो प्रहार हुआ,होती है हद पार
कोरोना भी मुफ्त मिला,चीनी  कारोबार
सीमाये तो फैल रही , फैला है विष बीज 
गुणवत्ता से युक्त नही  कोई चीनी चीज

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

नवीन वर्ष के हाथ रही

अंधियारा है काँप रहा 
 काँप रही है भोर 
नवीन वर्ष के हाथ रही 
 भावी कल की डोर
सपने हो आकार लिए
 अर्जुन या एकलव्य
उजियारा चहु और रहे 
 सबके सपने भव्य
अन्तर में है आग लगी 
बाहर भी है शोर
तृप्ति का है मार्ग सही
 तृष्णा का न जोर
उनका अपना जोर रहा 
 उनकी अपनी चाल 
जैसी जिसकी नियत है  
उसका वैसा हाल
आनंदित आकाश हुआ  
आंनदित उपवन 
आनंदित हो बात करो
हो मौलिक  दर्शन
जीवन है श्मशान नही 
पावन है स्थान 
अपनो को तू गले लगा 
क्यो करता प्रस्थान

सोमवार, 19 जुलाई 2021

ऊँचे ऊँचे लोग

उसके गुण का गान करो , जिसमे हो संस्कार 
कर्मठता का मान करो , कर्मो का सत्कार

जिसमे थी सामर्थ्य नही ,मिली उन्हें है छूट
दानव दल को बाँट रहा, अमृत घट के घूँट

भक्ति का अभिमान रहा , शक्ति से अनजान
क्यो उसका अपमान किया , जिसमे था भगवान

क्यो?इतना पाखण्ड रहा , क्यो इतना है पाप 
तू अपने दुष्कर्मो को , नाप सके तो नाप

राम नाम दिन रात जपा, बना नही है योग
सच के होते साथ नही , ऊँचे ऊँचे लोग




सोमवार, 28 जून 2021

मिले चोर ही चोर


धन से कोई धनी हुुुआ, बल से है बलवान
तू अपने सत्कर्मो से , खुद को बना महान

धन नही सुखी हुआ, दुख सुविधा के संग 
दुविधा में भी सुखी रहे , उसके संग उमंग

जब भी उनके होठ रही , प्यारी सी मुस्कान 
प्यारी प्यारी रही जिंदगी, हर मुश्किल आसान

जीना तो मुश्किल हुआ, मरना है आसान
जी जी करके रोज मरा , दुनिया मे इन्सान

अपनो से वे छले गये, मिले चोर ही चोर
आँसू थे जो सूख गये, ऐसा कैसा दौर

उनकी अपनी सोच रही , उनके रहे विचार 
तू ही अपना भाग्य बना, कर सपने साकार

खींची नई लकीर

गणपत  है  विराज  रहे  , साध  रहे  सब  काज  पग  प्रतिपल  गतिमान  रहे ,पद  कीर्ति  सर  ताज  पर्वत तो  कैलाश  रहा, गण  के  पति  गणेश  ...