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अंधी धन की भूख

अंधियारी इक रात हुई अंधियारे में बात अंधियारे में हुई साधना,अँधियारा सौगात अंधी बहरी हुई वेदना, अन्धा  बहरा युग अंधी होती रही कामना , अंधी धन की भूख अंधी होती रही आस्था, आस्था का सम्बल सीधा सच्चा चलो रास्ता , फैले है दल दल अंधो की न हुई शाम है , हुये दिन न रात अन्धो का है यही ठिकाना, अन्धो के दिन सात अंधो की है रही वेदना,, कर लो तुम अहसास भीतर उनके रही चेतना, अनुभव मोती पास  अंधे बहरे मौन रहे , सम्वेदना से शून्य सम्बन्धो से रिक्त हुए , ऐसे कैसे पुण्य

झुका नही यह सिर

प्रतिपल होते मस्त रहे ,भरते रहे उड़ान  वो सुविधा के संग रहे , मेरे संग मुस्कान उनका प्यारा कोई रहा ,मुझको सबसे प्यार  जीवन में  न कोई सगा, जाना है उस पार एक अकेला मौन रहा ,रहा भीड़ में शोर  जो न भीड़ का भाग रहा ,वह होता कुछ और दूजे को तो दोष दिया ,लिया स्वयं ने श्रेय  उसका होता कोई नही ,मिला नही है ध्येय  चंचल नदिया नीर रहा,रहा अडिग है गिर  जीवन मे तू आग लगा ,झुका नही यह सिर

चहकी न कोयल

जीवन मे मकरन्द नही  कहा गये वो शौक सृजन से तू स्वर्ग बना  कोरोना को रोक  चिड़िया रानी लुप्त हुई  चहकी न कोयल फल के मिलते पेड़ नही  फूटी नही कोपल उड़ते खग नभ संग रहे  करते रहे विचार  नभ तक क्यो विस्तीर्ण हुए ये बिजली के तार

निर्मल मन का तीर

रमता जोगी कहा चला, कहा चला है नीर निर्मलता अनमोल रही ,निर्मल मन का तीर जीवन भर विषपान किया, रहा कर्म में लीन उसका मत अपमान करो , बंधुवर दीन हीन  जो व्यक्ति है धैर्यविहीन , उसका शून्य वितान  संकल्पों से धैर्य रहा, श्रम से है उत्थान जीवन में निर्भयता का , सदगुण लेना भर जिसके मन आतंक नही, होता है निडर

अति में है अवरोह

जीवन भर ही काम किया , अब तो लो विश्राम विषयो से निर्लिप्त रहो , जाना है प्रभुधाम करना अतिरेक नही ,अति से है नुकसान अति ही बंधन बाँध रही , अति है दुख की खान कर्मो से वह रोज भगा, दिखलाता है पीठ जिसमे बल सामर्थ्य नही , वह होता है ढीठ अति अंतर्मन बांध रही ,अंतर्मन में मोह  अति तो केवल अन्त करे, अति में अवरोह

जिसकी ऊपर डोर

जो जितना ही दूर रहा, वह उतना ही पास ह्रदय के सामीप्य रहा , सुख दुख का अहसास बाहर से है सख्त कठोर , भीतर से कमजोर  उसके भीतर कौन रहा, जिसकी ऊपर डोर जो व्यक्ति उपकार करे , वह पाता सहयोग  जो स्वार्थी उपकार विहीन, पाया उसने रोग

हल बक्खर और बैल

महंगी होती कार गई , रहा फ्यूल का खेल खेतो से विलुप्त हुये , हल बक्खर और बैल मिलता नही शुध्द दही, नकली मिलते बीज सस्ती सबकी जान रही, महँगी होती चीज उनके अपने शौक रहे ,उनका था व्यापार  महामारी से टूट गया , कितना कारोबार भूखे नंगे भावविहीन , देखे कुछ इन्सान बीमारी ने छीन लिये ,जितने थे अरमान अब तो सबकी पीर हरो, हे!मेरे भगवान महामारी अब छीन रही , रिश्तों में थी जान