खो गए तारे वो सारे
खो गया कहीं चंद्रमा
दिख रहे सुन्दर नज़ारे
चोटियों पर हिम जमा
है प्रभा की रश्मियां ये
प्राची से है झाँकती
पंछीयो की टोलियाँ है
दूर गगन को नापती
जो अमावस कर न पाई
कर रही वो पूर्णिमा
जंगलों में अंचलों में
कुछ हिरण दल झूमते
अब कहीं नवगीत को है
मंत्रवत वो सुनते
पेड़ पर्वत खाइयों में
दिख रही कोई आत्मा
है यहां कुछ औस बूंदे
पर बादलों से वे न बरसे
त्रस्त होती ये धरा है
कंठ तरसे होंठ तरसे
दूर गए मौसम यहां से
हो गया अब खात्मा


