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सितंबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ताकते प्रतिबिम्ब है

झाँकते हर और चेहरे  ताकते प्रतिबिम्ब है  रास्ते जल से भरे है   दृश्य होने भिन्न है  दिखती है दिव्यता तो  प्राची की अरुणाई में  ओज और ऊर्जा पवन में  उम्र की तरुणाई में  रह गई परछाईया है  वक्त के पदचिन्ह है  दृष्टिगत होते क्षितिज में  कल्पना के रंग है  उम्र भर उड़ती  रही है लक्ष्य की पतंग है  वृहद व्यथा की कथा है  मन क्यों होता खिन्न है

मानव बनता है दानव

बजता डमरू महाकाल का  नाच रहे नंदी भैरव  नर से होते नारायण है  अर्जुन के केशव माधव  ऊँचे पर्वत गहरी नदिया नभ पर पंछी की कलरव हलचल होती मन के भीतर सृजन स्वर उपजे अभिनव झरते झरने सात समंदर  गहरे जीवन के अनुभव  अंधड़ ,पतझड़ ,बारिश की झड़, मौसम होते असंभव  ताल सरोवर भूमि  उर्वर  गिरता उठता है शैशव  धर्म कर्म की बात पुरानी  नया पुराना होता भव  जीवन से होता परिचय तो  जीवन की लीला है नव  जीवन ले ले कुदरत खेले  विपदायें भीषण तांडव  कटते  जंगल होते दंगल  मानव बनता  है दानव  विस्फोटक की खेप पुरानी  क्षत विक्षत बिखरे है शव

पुष्प से माला पिरोई

भाव सृजन की धरा  है  लेखनी मन  में डुबोई  आत्मीयता ह्रदय में  प्यार की आशा संजोई  चित्त  में चित्तचोर रहता  शब्दहीन संवाद करता  श्याम ने पाई न राधा  बाधाये जाने न कोई  हाथो में मेहंदी रची ज्यो  भक्ति प्रीती में भिंगोई  श्याम की बंशी बजी तो   मीरा राधा सी है खोई  गंध और सुगंध पाने  भवरे होते   है  दीवाने  पंख  सपनो से जुड़े है  पुष्प  से माला पिरोई