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शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

टिक रहा विश्वास है

प्रकृति की वंदना का 
होता तरीका खास है
निसर्ग में है स्वर्ग रहता
 स्वर्ग अब वनवास है

उत्थित हिमाचय के हृदय में
सहजता का वास है
टहनियां और फूल पत्ते
 कुदरती उल्लास है

जो रहा निर्भीक सा मन 
जिंदगी वह खास है
हट रहा तम हर सवेरे
मन में जगा विश्वास है

फिर नया जीवन पाया
पायी फिर से आस है
हर्ष में  है मग्न सारे
जग मग नया आकाश है
 

स्वर्ग भी उतरा जमीं पर
स्वर्ग का अहसास है
लक्ष्य की एक भूख सी है
हर मन मचलती प्यास है

धर चला अंगुल रथ पर
हे पार्थ क्यो? उदास है
 इंदु है वह  सिंधु गहरा
बिंदु मे ठहरी आस है

हर कही पाया है उसको 
रचता रहा वह रास है 
पिय मिलन आतुरता है
टिक रहा   विश्वास है

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

मात नर्मदे चपल तरंगे


पुण्य सलिला रेवा माता ,तेरे सदगुण मानव गाता
जप तप तेरे तट पर होते ,जप तप से है मन हरषाता

 
मात नर्मदे चपल तरंगे ,दर्शन पाकर हो गये चंगे
हर हर गंगे हर हर गंगे ,शिव की संगे शिव की अंगे
लहराकर इतराता आता कल -कल छल-छल बहता जाता

 
तव कीर्ति ही गाती बाणी ,तू उर्जा है तू महारानी, 

मै बालक तू मात भवानी तेरे तट बसते मुनि ध्यानी
जीवन मे जब तम गहराता तेरे तट पर मै आ  जाता

 
तट पनघट है तेरे गहरे ,सागर तट पर तू जा ठहरे
विजय पताका तेरी  फहरे  गिरती उठती पावन लहरे
तृप्त धरा को कर हरियाता तेरा जल तृष्णा हर पाता

http://tasveeronline.in/photographs/image.raw?type=img&id=873
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शुक्रवार, 11 मई 2012

माता मे ईश्वर, की सत्ता

माता से  है अनुपम रिश्ता,ममता मे रमता है ईश
ममता मे करूणा है रहती,करूणा मे रहती है टीस
माता की छाया मे जन्नत,बेटा तो है माँ की मन्नत
माता के चरणो मे रहकर ,भगवन का मिलता आशीष

माता के छलके जब आंसू  भावो की हो गई बारिश
माता मे ईश्वर, की सत्ता ,माता के है शक्ति-पीठ
माँ का प्यार न जिसने पाया,पाकर जीवन वह पछताया
माता का कर लो अभिनंदन,वंदन से हर्षित जगदीश

माता हो तो पोंछे आँसू, बिन माँ के रोई ख्वाईश
धरती होती सबकी माता,माताये होती दस-दिश
तन-मन जिस पर है इतराता ,सबसे प्यारी भारत माता
माता को है अर्पण जीवन,माता को अर्पित है शीश

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

हे मात! तेरे ही लिये


हे मात! तेरे ही लिये ,निज प्राण का उत्सर्ग है
निर्झर नदी हिमभूमी पर्वत,विकसित धरा है स्वर्ग है

ऋतुये विविध चहु  और है जन्मे यहा पर देव है
रही क्यारिया केसर भरी लटके यहा फल सेव है
तन-मन हुये पुलकित नयन बिखरा यहा निसर्ग है
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मधुपान करता है जीवन ,तपोभूमी पर है आचमन 
खेले यहा राधा-रमण,श्रीराम का वन मे गमन
सभी धातुये तुझमे रही ,रहता यहा हर वर्ग है
_ 
सेवा करे रेवा सदा ,निमाड है मालव भूमी
पर्वत खडे महादेव से,ऊँची चोटिया नभ ने चूमी
शिव शक्ति सा है आचरण ,उनका यहा संसर्ग है

सोमवार, 30 जनवरी 2012

माँ शारदे ,दुलारदे ,जीवन हमारा तार दे

माँ शारदे ,दुलारदे ,जीवन हमारा तार दे
वसन्त का न अंत हो ,वसंत की बहार दे

अकर्म का ही अंत हो ,नव चेतना जीवंत हो
चलते रहे सुमार्ग पर ,पथ पर सदा वसंत हो
वीणामयी पुकार दे ,जीवन मेरा सॅवार दे
माँ शारदे  ,हमे प्यार दे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
नही साधना अपूर्ण हो ,आराधना माँ पूर्ण हो
वात्सल्य का ही भाव हो, कौशल्यता निपुण हो
व्यवहार दे माँ माँ शारदे , विकार सारे मार दे
माँ शारदे ,हमे प्यार दे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
आनन्द ही कन्द हो और मुस्कराया छन्द हो
बहती हवाये मन्द हो,बिखरी हुई सुगन्ध हो
सम्वेदना ,विस्तार दे,विचार दे ,माँ शारदे
माँ शारदे ,हमे प्यार दे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
डिगे नही,बिके नही ,थके नही ,रुके नही
चरित्र मे हो दृढ़ता ,झुके नही ,चूके नही
निखार दे माँ शारदे ,व्यक्तित्व को निखार दे
माँ शारदे  ,हमे प्यार दे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

रविवार, 13 नवंबर 2011

गीत और संगीत करे ईश का गुणगान है

सुर भरी सुबह है सुर मयी शाम है,
पंछीयों के गान से मिट गई थकान है

बारीश की छम-छम से बजती नुपूर है,
महफिले है कुदरत कि नाचते मयुर है
नैसर्गिक जीवन मे संगीत विज्ञान है

झरनों के कल-छल मे राग है बसे हुये
भॅवरो की गुंजन भी रागीनि लिये हुये
कोकिल के कंठ से निसर्ग करती गान है

परमात्मा से रही आत्मा को प्रीत है
भावों से परिपूर्ण गीत और संगीत है
गीत और संगीत करे ईश का गुणगान है

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

होगा कर्मो का अभिनन्दन ,खिलते है सरोवर में सरोज

देने वाला खूब देता है , कर लेना तू !मौज
क्यों ?ढूँढता है उसको बाहर ,तुझ में उसकी ओज


अंधियारे में भरपूर सोया उजियारे में भगता रोज़
मिट जाए मन का अंधियारा हट जाएगा दिल से बोझ
कण कण के भीतर वह रहता तू !उसकी है फौज
तीरथ मूरत में न मिलेगा ,क्यों करता है उसकी खौज ?

कर दे अर्पण सारा जीवन ,ज्यादा तू !न सोच
बन जाएगा जब तू !उसका ,ढोयेगा वह तेरा बोझ
पूरा होगा ख़्वाब सुनहरा ,कौशिशे करना तू !रोज
होगा कर्मो का अभिनन्दन ,खिलते है सरोवर में सरोज

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

अर्चना की भावना को ,जन जन में उतारना है

अर्चना की कामना है ,अर्चना ही साधना है
अर्चना दीप्ती ह्रदय की ईश्वरीय मनोकामना है

प्यार का सागर गहरा ,चाहतो पर सख्त पहरा
अर्चना के रूप में ही ,प्यार की संभावना है
भावनाओं की सरिता, प्रेमिका प्यारी कविता
अर्चना वनवासी सीता, श्रीराम को पहचाना है

अर्चना शक्ति स्वरूपा ,शिव की आराधना है
अर्चना आत्मा की ज्योति, भक्त की उपासना है
अर्चना भावो का अर्पण, प्राणों का होती समर्पण
अर्चना भावानुभूति , निज इष्ट की स्थापना है

अर्चना दुखियो की सेवा ,कष्ट उनके काटना है
वनवासियों की वेदना से ,भावना को बांधना है
अर्चना सेवा समर्पण ,प्यार मिलकर बांटना है
अर्चना की भावना को ,जन जन में उतारना है

बुधवार, 14 सितंबर 2011

हे नाथ मेरे साथ हो

ईमान की धरती रहे ,सत्कर्म का अाकाश हो
अाराधना हो देव कि, निज ईष्ट पर विश्वास हो

सूर्य से चैतन्य हो ,जीवन हमारा धन्य हो
व्यक्तित्व के सौन्दर्य का, प्रभु !रत्न मेरे पाास हो

माॅ शारदे का वरद हस्त ,इस दास के ही माथ हो
चलता रहे  नित कर्म पथ पर ,नैराश्य नही वास हो 




विवाद विषाद मे भी ,न मन मेरा उदास हो
अग्यान का दूर हो अंधेरा  ग्यान का पकाश हो

न्याय का पथ हो पशस्त ,हो जाये दुर्भाग्य अस्त
आत्मा का उजला दर्पण ,रिश्तो मे मिठास हो

वो नदी है

नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है  टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई  वो है नेकी न बदी है  दिन होती रात ह...