संदेश

अप्रैल, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जो नजदीक है दूर हुए ,दूर रहते वो पास

रिश्तो का इतिहास रहा ,रिश्तो का  भू -गोल  रिश्ते लाते प्रीत रहे ,रिश्ते मीठे बोल  रिश्तो की  है  रीत रही ,रिश्तो के रिवाज  रिश्ते नाते टूट रहे ,निकली न आवाज  भावो से जो  रिक्त रहा रिश्तो से अनजान  रिश्तो की गहराई को ,मानव  तू पहचान  खूशबू से भरपूर रहा ,रिश्तों का अहसास  जो नजदीक है दूर हुए ,दूर रहते वो पास  रिश्तो से कुछ आस रही , मन  लगती है  ठेस  अपनो से तो पीर मिली , प्रीत मिली  परदेस

संतुष्टि तो मन की अवस्था है

संतुष्टि का कोई पैमाना नहीं होता कोई व्यक्ति एक बूँद पाकर संतुष्ट हो सकता है कोई व्यक्ति समुन्दर पाकर संतुष्ट नहीं होता संतुष्टि तो मन की अवस्था है असंतोष की कोई सीमा नहीं होती असंतुष्ट व्यक्ति को जितना मिल जाय कम है असंतुष्ट व्यक्ति को संतुष्ट करना  बहुत मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है असंतुष्ट व्यक्ति का साथ होता बहुत दुखदायी है संतोषी व्यक्ति ने सदा ही खुशिया बरसाई है संतुष्ट वह व्यक्ति है जो भीतर जो संत है भीतर की सत्ता की संतुष्टि का स्तर अनंत है संतुष्ट मीरा थी  जिसने गरल को पीया तो अमृत पाया है संतुष्ट संत रसखान थे  जिन्होंने धर्म को पूजा नहीं जिया है इसलिए  सदा संतुष्ट रहो असंतुष्ट रह कर कभी नहीं निकृष्ट और दुष्ट रहो