शनिवार, 1 जनवरी 2011
dard pardeshi nahi hai
धुल सी छाई हुई है हर तरफ फैली उदासी
प्रश्नों का चलता प्रशासन फिर मिली उत्तर को फांसी
छल कुटिलता से व्यथित मन स्वाद चखता है कसैला
सपनों की अर्थिया ढ़ोकर रह गया है जो अकेला
दर्द परदेशी नहीं है बन गया उर का निवासी
संवेदनाओ के खिलोने दिखते कितने सलौने
शब्दों के शिल्पी सौदागर आचरण के लोग बौने
असत्य का आधार बढ़ता सत्य फिर अज्ञातवासी
रिश्तो के किस्से अनूठे सेतु संवादों के टूटे
आस्थाए ढह गयी है रह गए स्वार्थो के खूटे
प्रीत पटरानी नहीं है बन गयी वैभव की दासी
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
हँसते हँसते मिट जाते हैं
अब भाव नही होते दर्पण जो आँखो से दिख जाते है न रही चेतना चिन्गारी अब कलमकार बिक जाते है कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा तलवे सत्ता के चाट रहा...
-
जिव्हा खोली कविता बोली कानो में मिश्री है घोली जीवन का सूनापन हरती भाव भरी शब्दो की टोली प्यार भरी भाषाए बोले जो भी मन...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें