बुधवार, 9 नवंबर 2011

माटी पर वह मर मिटा,लोहा था पिघल गया

कैसे देखे कोई सपने अाकाश के
हुई निर्लज्ज थी उनके अाॅख की हया
रक्त -रंजित रहे हाथ कर्मयोग के
पत्थरों को मिल रही हर तरफ से दया
चौराहे पर मिली थी हमे निष्ठुरता
मूर्तियों से शहर पूरा सजता गया
          सज्जनो के भाग मे अाऐ थे घोर तम
था समय बहुत विषम जीत फिर भी वह गया

सत्य की राह पर राही बढता गया
सूर्य सत्कर्म का नित्य उगता गया
थे नहीं खोंखले वादे इरादे ,
फौलादी मंसूबो ने फासला तय किया
,ढेरो थी मुसीबते वे हसते रहे
षड़यंत्र के चक्र व्यूह वे रचते रहे
दीप निर्विकल्प का ज्योति पुंज ले नया
शुभ संकल्प का दीप्त पथ कर गया


लेखनी क्रान्ति की दे रही है चेतना ,
ध्येय की अाग थी ,शोला बनता गया
खून अौर अाॅसू ने ,थी लिखी व्यथा कथा ,
मत सताना उसे ज्वाला वह बन गया
थी शहीद की चीता ,सीमा पर था डटा ,
माटी पर वह मर मिटा ,लोहा था पिघल गया
शत्रु दल दहल गया ,दे हौसलों को बल गया
इस वतन के राग को दे नई गजल गया

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