शनिवार, 20 सितंबर 2025
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नर्म कोमल सी हथेली
झर गई बारिश से कलियाँ पत्तिया बूँदों ने धोई है यहा अधरों पे खुशियां क्या कर गया श्रृंगार कोई डालियों पर फूल अटके शूल भी आँखों को खटके...
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जिव्हा खोली कविता बोली कानो में मिश्री है घोली जीवन का सूनापन हरती भाव भरी शब्दो की टोली प्यार भरी भाषाए बोले जो भी मन...