बुधवार, 15 जुलाई 2026

हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण 
जो आँखो से दिख जाते है 
न रही  चेतना चिन्गारी 
अब कलमकार बिक जाते है 
कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा 
तलवे सत्ता के चाट रहा 
जो लिख रहे हैं चिन्गारी 
हँसते हँसते मिट जाते हैं

सोमवार, 13 जुलाई 2026

भाव है संवेदना है

मूर्तियां  पत्थर  नहीं  है  
मूर्तियों  में  चेतना  है 
मूर्तियां  हैं  प्राण  वाहक 
सन्देश  ईश को  भेजना  है
शिल्पियों  की  ये  कहानी 
मूर्तियाँ  होती  पुरानी 
 मूर्तियां  सृजन  की  पूजन 
भाव  है  संवेदना  है 
मूर्तियां  जगती  रही  है 
मूर्तियां  सोती  रही  है 
मूर्त  होती कल्पना  तो 
सृजना की  वेदना  है 
मूर्तियाँ  कोमल  रही  है 
मूर्तियां  हलचल  रही  है 
मूर्तियां  दिखती  दिवारें 
मूर्तियां  निश्चल  रही  है 
मूर्तियां  से  बात  करके 
लक्ष्य  पावन  भेदना  है 

होता वह पिता है

खुद ही से है हारा
खुद ही से जीता है 
लड़ा युध्द जिसने 
बना विजेता है।
मरा है जिया है 
सभी कुछ किया है 
शिकायत न करता
वह होता पिता है 

शनिवार, 11 जुलाई 2026

सौन्दर्य नहीं था जीवन में

उनके वो आंसु पोंछ रहा
जिनकी पीडा मे पानी था 
जो दर्द बसा था सीने 
वो दुख की ही राजधानी था 
खाली खाली सा लगता था 
वो हरियाली सा दिखता था 
सौंदर्य नही था जीवन में 
तन मन की होती हानि था 

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

देखा दुखियों का क्रंदन है


यह कैसा होता बंधन हैं 
ये होता कैसा नन्दन है 

ये भाव अनोखे भरे भरे 
ये रिश्ते होते खरे खरे 
शब्दों के मोती झरे झरे 
इन आँखो में अभिनन्दन है 
हृदय से निकला वंदन है 

 ये मोर पंख की सुंदरता
 इस नभ से अमृत है बटता 
जीवन से रस न हैं घटता 
यहां समरसता का चंदन  है 
देखा दुखियो का कदन है j 

जिन  आँखों  में  है  प्यार  रहा 
उन  आँखों  में  आभार  रहा 
सबको  ईश्वर है  तार  रहा 
प्राणों  से  उसके  तार  जुड़े  
ये  प्राणों  का  स्पन्दन  है 


बुजुर्ग की व्यथा

उसके जो भी थे इरादे 
वो अभी तक सींच लिए हैं 
साथ में रहता न कोई 
हाथ भी तो खींच लिए है 
जब खुशी होठों न आयें  
नही आंखे मुस्कुराए 
हम  रहेगे  किसलिए  है 
 हम जिएंगे किसलिए  है 


शनिवार, 4 जुलाई 2026

कहते

होंठ  जिसको  गुनगुनाये 
तो  उसे  हम  गीत  कहते 
ये  हृदय  भूलने  न  पाए 
तो  उसे  हम  मीत कहते 
जो  पुरानी  रुढियों  को 
पीढ़ियों  से  जी  रही  है 
हम  उसे  हैं  प्रीत  कहते
तुम  उसे  है  रीत  कहतें 

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

छन्द को जीवन तो दे दो



छन्द को जीवन तो दे दो
ज़िंदगी गाती नही है 
गीत कोई मर रहा हैं 
गीत का साथी नही है 
है अधूरे और पुराने 
गीत हृदय में लिखे है
 पंखुड़ी से प्रीत करते
 भ्रमर भी गुंजित दिखे है 
वो नही होती है कविता 
जो होंठ पर आती नही है 

रविवार, 28 जून 2026

हर हृदय को भेदना है

अक्षरों को  यूँ सजाकर

हर हृदय को भेदना है 

ईश्वर पत्थर नही है 

वह सहज सम्वेदना है 

हो भले काली कोयलिया

प्रीत के गीत गायेगी

लाएगी बारिश धरा पे

खुद को को वो तरसायेगी

आत्मा को शुद्ध कर कर 

ईश मिलन को भेजना है 

शुक्रवार, 15 मई 2026

पर कुछ न कुछ तो लोच है



 अब  यहां  उत्तर  भटकते 
और  खटकती सोच  है 
पंख  फैले  पंछीयो  के 
 दिख  रही  यहां  चोंच  है 

अब  हमें  परछाईयों  
गहराइयों  को  जानना  है 
रास्ते  में क्यों उखड़ती
 हर  श्वास  को  पहचानना  है 
प्रश्न  शाश्वत  है पुराने  
पर  नवीनतम  खोज  है 


हो गई  भयभीत  लताएँ 
चिड़िया  न गीत  गाये 
चिट्ठियां  आती  नहीं  अब 
दिल  की  बातें  जो  बताए 
न कभी  स्वीकारते  वे  
पर  कुछ न कुछ तो लोच  है 

शुक्रवार, 8 मई 2026

ठहरी हुई टहनी है


व्यथा  की  कथायें 
 बहुत  कुछ  कहनी है 
ठहरे  हुये  पल 
 ठहरी  हुई    टहनी है
क्रीड़ा  में  पीड़ा  है
  पीड़ा  में  क्रीड़ा  है 
मौसम  की  गर्मी  ही
  आज हमें  सहनी  है 

मंगलवार, 5 मई 2026

तो कभी वह घी रहे हैं


वे कभी अमृत रहे हैं
 तो कभी वह घी रहे हैं 
जब कथायें न सुहाती 
तो व्यथा को जी रहे है 
है. जहां से सूर आया 
गीत और संगीत पाया
 गीत और संगीत सरगम 
ज़ख्म हर गम सी रहे है

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

दिख रही कहीं आत्मा

खो  गए  तारे  वो  सारे 
खो  गया  कहीं  चंद्रमा 
दिख  रहे  सुन्दर  नज़ारे 
चोटियों  पर  हिम जमा

है प्रभा की रश्मियां  ये 
प्राची  से  है  झाँकती 
पंछीयो की  टोलियाँ  है 
दूर  गगन  को  नापती
जो  अमावस  कर  न  पाई 
कर  रही  वो  पूर्णिमा

जंगलों  में  अंचलों  में 
कुछ  हिरण  दल झूमते  
अब  कहीं  नवगीत  को  है 
मंत्रवत  वो  सुनते  
पेड़  पर्वत  खाइयों में 
दिख  रही  कोई  आत्मा 



है  यहां  कुछ  औस बूंदे 
 बादलों  से  वे  न  बरसे 
त्रस्त  होती  ये  धरा  है 
कंठ  तरसे  होंठ  तरसे 
दूर  गए  मौसम  यहां  से 
हो  गया  अब  खात्मा 





शनिवार, 25 अप्रैल 2026

टूटा है क्यों भाई


रोती  हुई  भावुकता  
ठहरी  हुई  गहराई  
पर्वत को  चीर  कर  ये 
नदिया  एक  बह आई 
साहित्यिक  सृजन  है  
कर्मों  का  पूजन  है
अपनों  से  रूठा क्यों  
टूटा  है  क्यों  भाई 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

जब चेतना होती मीरा है


दीप देता  रोशनी  तो 
यामिनी  से  तम घिरा  है 
रेत  बनती है किनारे 
गहराई  बनता हीरा  है 
दुख  देती  जिंदगी  तो 
सुख  देती  जिंदगी 
ईश तो  मिलते  तभी  है 
जब  चेतना  होती  मीरा  है

 

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

राह से जीवन बना रे



चाह  में  है  राह  रहती 
राह  में  सुन्दर  नजारे
राह  में  मुश्किल  रही  है 
 राह  में  झिलमिल  सितारे 
राह  में  कंकड  है  पत्थर 
 राह  में  सोये  न  थककर 
राह  से  होकर  मिले  हैं  
चोटियां  उत्कर्ष  प्यारे 
राह  कुछ  गाती  रही  है  
राह  तो  साथी  रही  है 
राह  में  अनुभूतियां  है 
 राह  से  जीवन  बना  रे


शनिवार, 11 अप्रैल 2026

प्रेम

प्रेम  के  मन्दिर  न मिलते  . न प्रेम  की  मस्जिद  है 
प्रेम  मुश्किल  से  मिला  है,  प्रेम  मन  का  मीत है 

प्रेम  से  मुस्काया  मौसम   ,प्रेम भव का  हित  है 
प्रेम का दस्तूर पुराना  ,प्रेम  कविता  गीत  है 

प्रेम  शब्दों  से  हुआ  तो  ,भाव  से  परिचित  है 
प्रेम  मौखिक  सा  रहा  है,  प्रेम  अलिखित  है 

है  कोई  लड़की  दीवानीं,  लड़का  दीवाना  मीत है 
प्रेम  पागलपन  नहीं  है , प्रेम  न कोई  जिद  है 

प्रेम  से  सबको  पुकारी,  प्रेम  से  सृष्टि  निहारो 
प्रेम  है  अंधे  की  लाठी  , प्रेम   गद्य ललित  है 

प्रेम  की  सूक्ति  रही   ,क्यों  प्रेम  से  भयभीत  है 
प्रेम  निर्मल  भावना  है , ईश की  यह  प्रीत  है 

प्रेम  न  उन्माद  होता , न  हार  होता  जीत  है 
प्रेम  में  व्याकुल  हुआ  मन, प्रेम  आकुल चित है 

प्रेम  से  रहना  पड़ेगा,  प्रेम  से  बढ़ना  पड़ेगा 
प्रेम  की  ताकत मिली तो ,जीत  हुई  निश्चित  है 

प्रेम  है  पावन पुरातन   रीत  है  नवनीत  है 
प्रेम  मर्यादा सनातन  जनता  जनार्दन  हित  है 

प्रेम  का  दीपक  जला  तो  ,भाव  होते  दीप्त  है 
प्रेम  यह  परिचय  कराता ,यहां  हार  में  भी  जीत  है 

प्रेम में  बरसा  है  पानी  प्रेम  में  मीरा  दीवानी 
प्रेम है शिवा  शिवानी , नृत्य   है  संगीत  है 

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

कितना भी आगे

बताओ  यहां  वन कितना  घना  है 
चलो  तुम  आगे यहां डरना  मना  है 
लगे  फूल  प्यारे और  पत्ते  जो  सारे 
हरा  है अभी  तक  ये  मोटा  तना है

यहां  से  हम जायेगे कितना भी आगे 
पीछे  पीछे  हम  थे चला  लक्ष्य आगे 
पसीना  ये  चाहे  कितना  बहा  है 
जटिलता  रही  है  उलझे  और धागे 


मंगलवार, 20 जनवरी 2026

और पपीहा गाएगा



है अंधेरा तो उजाला भी 
यहां पर आयेगा
यह मयूरा वन के भीतर 
इस तरह हर्षायेगा 
जिंदगानी लेगी करवट 
लौट जायेगी जवानी 
पानी पानी हर समस्या
 याद न आएगी नानी 
झूम कर आयेगा सावन 
और पपीहा गाएगा 

हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण  जो आँखो से दिख जाते है  न रही  चेतना चिन्गारी  अब कलमकार बिक जाते है  कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा  तलवे सत्ता के चाट रहा...