गुरुवार, 27 मार्च 2025

आस्था की झांकी

खिला है सरोवर 
खिला है किनारा
किया है किसी ने 
कमल को ईशारा
बना है यहां पर 
जल का है दर्पण
क्षितिज से उदित हो 
सूरज है पधारा

थोड़ा सा सफर है 
जीवन का है बाकी
थकन नहीं मिटती 
पिला दे है साकी
कहा गए अपने 
अधूरे है सपने
देखे नहीं दिखती है
आस्था की झांकी


रहे हौसले तो बदलेगी ये दिन

सुखद और दुखद पल 
नदी ने जिया है
 रेतीली डगर पर 
सफर तय किया है
बिखरते हुए पल 
फिर भी न बिखरी
दिया जग को अमृत
 जहर खुद पिया है

नदी के किनारे 
ओझल हो मुमकिन
मिले न सहारे 
हो कठिनाई अनगिन
अंधेरे में दीपक 
बनकर जलेंगे 
रहे हौसले तो 
बदलेंगे ये दिन

बुधवार, 26 मार्च 2025

नदी नहीं हारी



नदी में सदी है नदी का किनारा
नदी ने है वन को शहर को संवारा 
छोटी हो या मोटी नदी देती रोटी
नदी होती किस्मत नदी है सहारा

नदी मन के अन्दर नदी है समंदर
नदी से है लड़ते कितने सिकन्दर 
नदी है कुआरी नदी नहीं हारी
भंवर है नदी में ,नदी में बवंडर

नदी होती माता नदी को बचाओ
चहकते है खगदल इन्हें मत सताओ
नदी बहती अविरल नदी होती निर्मल
नदी में न कचरा जहर को बहाओ 

नदी लेती करवट नदी चीरती पर्वत
नदी की हकीकत तो जाने पनघट 
यह कितना है प्यारा नदी का किनारा
नदी ने सम्हाले कितने ही मरघट

 वो खोई है  खोई नदी नहीं रोई
कल छल है करती नदी नहीं सोई
जहा भी हरा है नदी की धरा है
नदी ने है माटी भिगोई है बोई 

नदी में है औषध रोगों को भगाओ
नदी देती जीवन लोगो को जगाओ
नदी में मैला है नदी में खेला है 
तरसते होठों को नदी तक है लाओ








मंगलवार, 25 मार्च 2025

गहराई पाई

कही ऊंचे पर्वत तो कही गहरी खाई 
शिखर से वो झर के नदी बन के आई
नदी बन के तोड़े है अहम के वो पर्वत
अहम को मिटा कर है गहराई पाई


हर दिल को वो जीत गया 
अच्छा एक इन्सान 
जीवित स्वाभिमान रखा
जीवित रखा ईमान

रविवार, 23 मार्च 2025

अदभुत हुए प्रबंध

मंत्रों से कब मोक्ष मिला
शब्दों से कब छंद
संवेदना जब साथ रही
अदभुत हुए प्रबंध 

सुन लो समझो जान लो
शब्दों के भावार्थ
जिसने सीखा जिया वही
जीवन का यथार्थ

शनिवार, 22 मार्च 2025

सुधरी न तकदीर

तकदीरों से नहीं मिला 
कोई भी है लक्ष्य
पौरुष कर पुरुषार्थ करो 
जीवन का है सत्य

उनको कीर्ति नहीं मिली
जिनको उसकी चाह
कर्मठ करता कर्म रहा
होकर बेपरवाह 

फूलों से मकरंद मिला
भंवरे से उमंग
होली में है रास रहा
लगे रंग पे रंग

उतने पैदल दूर चले 
जितना बल था पास
उतना ही सामर्थ्य रहा 
उतना ही विश्वास

कितने सारे संत मिले
कितने मिले फकीर
जीवन जहां था वहीं रहा
सुधरी न तकदीर

खिले धूप में फूल रहे
मरुथल मिले बबूल
जहा सुविधा की छाँव रही
वहा दुविधा के शूल






मंगलवार, 18 मार्च 2025

तारो से कितने बिन्दु

चमके नभ पे अंधियारे में 
तारो से कितने बिन्दु 
नीला सा उन्मुक्त गगन है 
नीला नीला है सिन्धु 
पीड़ाएं तन मन की हरती
चिड़िया से चहकी यह धरती 
कुदरत रानी खिली हुई है
खिला हुआ नभ पर इंदु


आस्था की झांकी

खिला है सरोवर  खिला है किनारा किया है किसी ने  कमल को ईशारा बना है यहां पर  जल का है दर्पण क्षितिज से उदित हो  सूरज है पधारा थोड़ा सा सफर है...