यहाँ वहा इधर उधर जाते है जिधर
सुनाई देता है बस एक यही स्वर !
कौनसी जाति कुल गौत्र के हो बंधुवर ?
सुनते ही मन की सारी उमंगें तरंगे
जाने कहा खो गई
निर्जीव सी हो गई तन की चेतना
कुछेक पलो के लिए
टूटी जब तंद्रा तो चिंतन के द्वार पर खड़े थे
वे सारी विभूतिया जो हुए थे सिर्फ कर्म से महान
और यहाँ कुछ व्यक्तियों को अपने कुल पुरुषो की उपलब्धियों पर है गुमान
भले ही उनके द्वारा स्थापित आदर्शो का ज़रा भी न भान
फिर भी यदा कदा यत्र तत्र करते रहते है उनका बखान
अरे भाई नव युग ने ली अंगडाई बहुआयामी क्रांति के दौर में कई नवीन धाराए आई
और तुम्हारी बुध्दी से अभी तक यह धुल हट नहीं पाई
यह दुनिया उसकी ही हो पाई जिसने स्वयं श्रम पुरुषार्थ के सहारे अपनी अलग पहचान बनायीं
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