ज्ञान सूर्य का हुआ उदय तो सुधरा कल और आज
कुरीतिया मिट गई विकसित हुआ समाज
अशिक्षा के अंधकार में अत्याचारी करते राज
साक्षरता के ज्ञान से सुधर गए सब काज
जुड़ा हुआ मालव माटी से सुनहरा इतिहास
मूरख से विद्वान् बने थे कविवर कालिदास
रविवार, 24 जुलाई 2011
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वो नदी है
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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यह कैसा होता बंधन हैं ये होता कैसा नन्दन है ये भाव अनोखे भरे भरे ये रिश्ते होते खरे खरे शब्दों के मोती झरे झरे इन आँखो में अभिनन्दन है ...
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जिव्हा खोली कविता बोली कानो में मिश्री है घोली जीवन का सूनापन हरती भाव भरी शब्दो की टोली प्यार भरी भाषाए बोले जो भी मन...
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यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है अनुभव से सब कुछ पाया है अनुभूति जितनी गहरी हो ठहरी उतनी ही काया है जब घना अँधेरा छाता है चिंतन ...
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