परिधानों में लिपट लिपट कर
नग्न हुआ है आदमी
नई सभ्यता से बहका है
सौम्य सरल वह आदमी
रही नहीं है अब वह नरमी
शेष नहीं आँखों में पानी
आत्म मुग्धता के दर्पण में
खो जाता है आदमी
डूबा वासना में तो प्यार
टूट गए है दिल के तार
क्या होगा रे भावी कल में
नहीं ये सब कुछ लाजमी
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