परिधानों में लिपट लिपट कर
नग्न हुआ है आदमी
नई सभ्यता से बहका है
सौम्य सरल वह आदमी
रही नहीं है अब वह नरमी
शेष नहीं आँखों में पानी
आत्म मुग्धता के दर्पण में
खो जाता है आदमी
डूबा वासना में तो प्यार
टूट गए है दिल के तार
क्या होगा रे भावी कल में
नहीं ये सब कुछ लाजमी
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नापती खुद को नदी है
तय जो कर पाई समय को, खो गई कोई सदी है खोह, पर्वत, खाइयों से बहकर आई नदी है पत्थरों से जो संवरती, गीत में संगीत भरती, खोजती अपना धरातल, हौसलो...
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यह कैसा होता बंधन हैं ये होता कैसा नन्दन है ये भाव अनोखे भरे भरे ये रिश्ते होते खरे खरे शब्दों के मोती झरे झरे इन आँखो में अभिनन्दन है ...
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जिव्हा खोली कविता बोली कानो में मिश्री है घोली जीवन का सूनापन हरती भाव भरी शब्दो की टोली प्यार भरी भाषाए बोले जो भी मन...
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