कड़े सुरक्षा के घेरो में रहे निरंतर जो पहरों में
छुपी हुई है निष्ठुरता तो कुर्सी के कुत्सित चेहरों में
जटिल प्रक्रियाओं में घिर कर मिटी योजनाओं की स्याही
संवेदना का का स्वांग रच रही शोषणकारी नौकर शाही
कैद हो गई है जनता की किस्मत अब तो उन्ही करो में !!1!!
धसे हुए है प्रगति पहिये बिकी हुई सम्पूर्ण व्यवस्था
थकी हुयी बेहाल जिंदगी ढूंढ रही खुशहाल अवस्था
समाधान के सूत्र खोजती बीत गई आयु शहरों में !!2!!
यश वैभव की ऊँची मीनारे कलमकारों को ललचाये
चाटुकारिता के हाथो में राज्य नियंत्रण रह जाए
सिमट गए सुख के उजियारे चमचो के आँगन कमरों में !!3!!
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वो नदी है
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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यह कैसा होता बंधन हैं ये होता कैसा नन्दन है ये भाव अनोखे भरे भरे ये रिश्ते होते खरे खरे शब्दों के मोती झरे झरे इन आँखो में अभिनन्दन है ...
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जिव्हा खोली कविता बोली कानो में मिश्री है घोली जीवन का सूनापन हरती भाव भरी शब्दो की टोली प्यार भरी भाषाए बोले जो भी मन...
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यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है अनुभव से सब कुछ पाया है अनुभूति जितनी गहरी हो ठहरी उतनी ही काया है जब घना अँधेरा छाता है चिंतन ...

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