विकलांगता
सपनो को तोड़ नहीं सकती
मानसिकता
गुलामी की दौड़ नहीं सकती
हर
एक अँधेरे को रही दिए की तलाश है
उजाले
की प्यास कभी मुंह मोड़ नहीं
सकती
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...