गुरुवार, 17 जुलाई 2014

परमानंद

व्यक्ति प्रतीक हो या स्थान
 उसे पवित्र  बना दो पर 
इतना पवित्र बना भी मत दो कि
 उनसे  दुरी स्थापित हो जाए 
उनमे परायापन लगने  लगे
किसी व्यक्ति विशेष को 
इतना पूजनीय आदरणीय मत बना दो कि 
उससे हम अनुकरण न कर सके 
और हम उसे सिर्फ पूजते रहे 
स्वयं को इतना श्रेष्ठ मत मान लो 
कि  हम जन सामान्य से दूर हो जाए
ऐसी पवित्रता ऐसा पूज्य होना ऐसी श्रेष्ठता 
जो आराध्य को साधक से दूर कर दे 
और स्वयं को जन सामान्य को दूर
निरर्थक है मिथ्या है पाखण्ड से परिपूर्ण है 
हमें तो ऐसी सहजता चाहिए 
और ईष्ट में ऐसी सरलता चाहिए 
कि चहु और अनुभूति होती रहे ईष्ट कि
और हम डूब जाए परमानंद में

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