जिसने कृष्ण की अंगुली थामी , निर्भय हुआ , मुक्त हुआ !
अब भाव नही होते दर्पण जो आँखो से दिख जाते है न रही चेतना चिन्गारी अब कलमकार बिक जाते है कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा तलवे सत्ता के चाट रहा...
जिसने कृष्ण की अंगुली थामी , निर्भय हुआ , मुक्त हुआ !
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