रविवार, 28 जून 2026

हर हृदय को भेदना है

अक्षरों को  यूँ सजाकर

हर हृदय को भेदना है 

ईश्वर पत्थर नही है 

वह सहज सम्वेदना है 

हो भले काली कोयलिया

प्रीत के गीत गायेगी

लाएगी बारिश धरा पे

खुद को को वो तरसायेगी

आत्मा को शुद्ध कर कर 

ईश मिलन को भेजना है 

नापती खुद को नदी है

तय जो कर पाई समय को, खो गई कोई सदी है खोह, पर्वत, खाइयों से बहकर आई नदी है पत्थरों से जो संवरती, गीत में संगीत भरती, खोजती अपना धरातल, हौसलो...