अक्षरों को यूँ सजाकर
हर हृदय को भेदना है
ईश्वर पत्थर नही है
वह सहज सम्वेदना है
हो भले काली कोयलिया
प्रीत के गीत गायेगी
लाएगी बारिश धरा पे
खुद को को वो तरसायेगी
आत्मा को शुद्ध कर कर
ईश मिलन को भेजना है
तय जो कर पाई समय को, खो गई कोई सदी है खोह, पर्वत, खाइयों से बहकर आई नदी है पत्थरों से जो संवरती, गीत में संगीत भरती, खोजती अपना धरातल, हौसलो...