शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

कौड़ी की भी देह नही

ज्यो ज्यो जलती ज्योत रही महका है परिवेश
पावन सुरभित पवन बही अनुभूति होती विशेष

अनुभव से तू जान रहा कर अनुभव का मान 
अनुभवी से सूत्र मिले , बन जाते हर काम

हर दर्पण में झांक रहा ताक रहा है रूप
मद यौवन का गया नही पद कुर्सी की भूख

खुद ही पर है जोर रहा खुद को कर बलवान
खुद में ही जो दोष दिखे उनकी कर पहचान

तुझमे तेरे देव रहे खुद पर कर विश्वास
कौड़ी की भी देह नही बन जाती जब लाश

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 19 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आदरणीय सर,
    बहुत ही सुंदर सन्देश देती यह कविता। कबीर के दोहे याद दिला रही है।
    आपके ब्लॉग पर पहली बार आ कर अच्छा लगा।
    आपसे अनुरोध है कि मेरे भी ब्लॉग पर आएं जहाँ मैं अपनी स्वरचित कविताएं डालती हूँ।
    अपने ब्लॉग की लिंक कॉपी नहीं कर पा रही पर यदि आप मेरे नाम पर क्लिक करें तो वो आपको मेरे प्रोफ़ाइल पर ले जाएगा। वहाँ मेरे ब्लॉग के नाम "काव्यतरंगिनी" पर क्लिक करियेगा, आप मेरे ब्लॉग पर पहुंच जायेंगे। आपके प्रोत्साहन व आशीष के लिए हृदय से उभरी रहूँगी।
    धन्यवाद

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  3. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति

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