ओ अषाढ़ के प्यारे बादल
भीगने दो धरती का आँचल
शीतल बूंदों की छम छम से
बजने दो खुशियों की पायल ||1||
ग्रीष्म ऋतू की उष्ण हवाए
सबको कर देती घायल
ओ घुंघराले काले बादल
झूम झूम कर बरसा दो जल ||2||
कोकिल की मीठी स्वर लहरी
आमंत्रित करती श्यामल
संवेदना की प्रतिमूर्ति बन
शुष्क जगत को करो तरल ||3||
तेरी चाहत के दम पर ही
जीवित जग की चहल पहल
स्नेह भले ही नभ से रखना
दिखला देना छवि धवल ||4||
शोषक बनकर रवि किरणों ने
सौख लिया पानी निर्मल
सूखी सरिता की रेती के
कण कण में फैला हल-चल ||5||
ओ इन्द्रलोक के रहने वाले
मुक्त हवा संग बहने वाले
बनो नहीं तुम उच्छ्रंख्ल
बन जाओ दुखियो के संबल ||6||
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