दुरभि रही संधिया और पैतरे कई लाये है क्योकि नैतिकता के मायने नेता जी ने पाये है
झूठी रही दोस्ती रचते रहे प्रपंच नेता जी ने साध लिया लूट लिया है मंच
थोडी थोड़ी गल रही है थोड़ी थोड़ी जल रही है है पुरानी वेदनाये गीत में जो ढल रही है जो हमारे हित में थीं जो तुम्हारी...
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