दुरभि रही संधिया और पैतरे कई लाये है क्योकि नैतिकता के मायने नेता जी ने पाये है
झूठी रही दोस्ती रचते रहे प्रपंच नेता जी ने साध लिया लूट लिया है मंच
अब भाव नही होते दर्पण जो आँखो से दिख जाते है न रही चेतना चिन्गारी अब कलमकार बिक जाते है कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा तलवे सत्ता के चाट रहा...
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