दुरभि रही संधिया और पैतरे कई लाये है क्योकि नैतिकता के मायने नेता जी ने पाये है
झूठी रही दोस्ती रचते रहे प्रपंच नेता जी ने साध लिया लूट लिया है मंच
चाह में है राह रहती राह में सुन्दर नजारे राह में मुश्किल रही है राह में झिलमिल सितारे राह में कंकड है पत्थर राह मे...
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