दुरभि रही संधिया और पैतरे कई लाये है क्योकि नैतिकता के मायने नेता जी ने पाये है
झूठी रही दोस्ती रचते रहे प्रपंच नेता जी ने साध लिया लूट लिया है मंच
अब यहां उत्तर भटकते और खटकती सोच है पंख फैले पंछीयो के दिख रही यहां चोंच है अब हमें परछाईयों गहराइयों को जानना है ...
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