दुरभि रही संधिया
और पैतरे कई लाये है
क्योकि
नैतिकता के मायने
नेता जी ने पाये है
झूठी रही दोस्ती
रचते रहे प्रपंच
नेता जी ने साध लिया
लूट लिया है मंच
अंधियारा रह रह कर आंसू को पीता है चलते ही रहना है कहती यह गीता है कर्मों का यह वट है निश्छल है कर्मठ है कर्मों का उजियारा युग युग तक जीता ह...
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