कुल्हड़ की
वह चाय नहीं है
मैथी का न साग
चूल्हे में
वह आग नहीं
कंडे की न राख
माटी की सुगन्ध
है बिछड़ी
कहा गई वह
प्यारी खिचड़ी
जितने भी थे
रिश्ते बिखरेलगे स्वार्थ के दाग
है अंधेरा तो उजाला भी यहां पर आयेगा यह मयूरा वन के भीतर इस तरह हर्षायेगा जिंदगानी लेगी करवट लौट जायेगी जवानी पानी पानी हर समस्या याद न...