जब ज्योति से ज्योत जली
जगता है विश्वास
जीवन में कोई सोच नहीं
वह करता उपहास
होता है जो मूढ़ मति
जाने क्या कर्तव्य
जिसका होता ध्येय नहीं
उसका न गंतव्य
गुजरा पल तो बीत गया
तू कल को है सीच
इस पल में जब ज्योत जली
रोशन है हर चीज
जिसने तिरस्कार सहा किया है विष का पान जीवन के कई अर्थ बुने उसका हो सम्मान कुदरत में है भेद नहीं कुदरत में न छेद कुदरत देती रोज दया कुदर...
सुन्दर
जवाब देंहटाएंसुंदर रचना।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
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