दीप देता रोशनी तो
यामिनी से तम घिरा है
रेत बनती है किनारे
गहराई बनता हीरा है
दुख देती जिंदगी तो
सुख देती जिंदगी
ईश तो मिलते तभी है
जब चेतना होती मीरा है
थोडी थोड़ी गल रही है थोड़ी थोड़ी जल रही है है पुरानी वेदनाये गीत में जो ढल रही है जो हमारे हित में थीं जो तुम्हारी...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें