रोती हुई भावुकता
ठहरी हुई गहराई
पर्वत को चीर कर ये
नदिया एक बह आई
साहित्यिक सृजन है
कर्मों का पूजन है
अपनों से रूठा क्यों
टूटा है क्यों भाई
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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