बुधवार, 23 सितंबर 2026

नापती खुद को नदी है

तय जो कर पाई समय को,
खो गई कोई सदी है
खोह, पर्वत, खाइयों से
बहकर आई नदी है

पत्थरों से जो संवरती,
गीत में संगीत भरती,
खोजती अपना धरातल,
हौसलों से जो लदी है

हर लहर से प्यार करती
नित्य नव शृंगार करती
वो कहीं चुप्पी को धरकर 
नापती खुद  को  नदी  है 

पेड़  की  वह  छांव  रहती 
हर  घड़ी  कुछ  भाव  कहती 
वो  कभी  झरनों  सी  बह कर 
बाँध  से  भी  न  बँधी  है 

4 टिप्‍पणियां:

  1. नदी का बहना जीवन के साहस,
    अटूट प्रवाह और आत्म-खोज का ही एक रूप है।
    बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना सर।
    -------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २५ सितंबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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