खो गई कोई सदी है
खोह, पर्वत, खाइयों से
बहकर आई नदी है
पत्थरों से जो संवरती,
गीत में संगीत भरती,
खोजती अपना धरातल,
हौसलों से जो लदी है
हर लहर से प्यार करती
नित्य नव शृंगार करती
वो कहीं चुप्पी को धरकर
नापती खुद को नदी है
पेड़ की वह छांव रहती
हर घड़ी कुछ भाव कहती
वो कभी झरनों सी बह कर
बाँध से भी न बँधी है
वाह!! सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंनदी का बहना जीवन के साहस,
जवाब देंहटाएंअटूट प्रवाह और आत्म-खोज का ही एक रूप है।
बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना सर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २५ सितंबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
अत्यंत सुंदर
जवाब देंहटाएंसुंदर
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