बुधवार, 23 सितंबर 2026

नापती खुद को नदी है

तय जो कर पाई समय को,
खो गई कोई सदी है
खोह, पर्वत, खाइयों से
बहकर आई नदी है
पत्थरों से जो संवरती,
गीत में संगीत भरती,
खोजती अपना धरातल,
हौसलों से जो लदी है
हर लहर से प्यार करती
नित्य नव शृंगार करती
वो कहीं चुप्पी को धरकर 
नापती खुद  को  नदी  है 

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नापती खुद को नदी है

तय जो कर पाई समय को, खो गई कोई सदी है खोह, पर्वत, खाइयों से बहकर आई नदी है पत्थरों से जो संवरती, गीत में संगीत भरती, खोजती अपना धरातल, हौसलो...