वे कभी अमृत रहे हैं
तो कभी वह घी रहे हैं
जब कथायें न सुहाती
तो व्यथा को जी रहे है
है. जहां से सूर आया
गीत और संगीत पाया
गीत और संगीत सरगम
ज़ख्म हर गम सी रहे है
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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