व्यथा की कथायें
बहुत कुछ कहनी है
ठहरे हुये पल
ठहरी हुई टहनी है
क्रीड़ा में पीड़ा है
पीड़ा में क्रीड़ा है
मौसम की गर्मी ही
आज हमें सहनी है
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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