पत्तिया बूँदों ने धोई
है यहा अधरों पे खुशियां
क्या कर गया श्रृंगार कोई
डालियों पर फूल अटके
शूल भी आँखों को खटके
नर्म कोमल सी हथेली
टहनियो को यहा चुभोई
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
सुंदर सृजन, वर्तनी का ध्यान रखें
जवाब देंहटाएंबेहतरीन
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