कर रहे श्रृंगार झरने
चल पड़े बादल यहा पे
सिंधु से जल को है भरने
न रही मासूम कलियां
जब रहा संसार छलिया
रह गई केवल घटाए
और सपने थे बिखरने
इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की अमर धरोहर मालवा की धरती केवल कृषि, व्यापार और वीरता की भूमि नहीं रही, बल्कि यह भारत की उन प्राचीन सा...
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 12 अगस्त 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
वाह
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