सो गई है रात ऐसी
पीठ पीछे दोगले है
सामने बनते हितैषी
हौसले अब थक चुके हैं
स्वाद दुख के चख चुके है
जग यहा होता न अपना
कामनाए है विदेशी
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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