जागती है ये सुबह सो गई है रात ऐसी पीठ पीछे दोगले है सामने बनते हितैषी हौसले अब थक चुके हैं स्वाद दुख के चख चुके है ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें