थोड़ी थोड़ी जल रही है
है पुरानी वेदनाये
गीत में जो ढल रही है
जो हमारे हित में थीं
जो तुम्हारी प्रीत में थी
बात ऐसी तुम बताओ
बात ऐसी हम बताये
वो तुम्हारी और हमारी
ज़िंदगी का कल रही है
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
सुंदर सृजन
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