सौपती खुद को सदी है
टिमटिमाती रोशनी सी
झोंपड़ी से वो बँधी हैं
मन को भायी वो सुहाई
वो है नेकी न बदी है
दिन होती रात होती
किन्तु यंत न यदि है
वो नदी है वो नदी है
हौसलों से वो लदी है
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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