देने वाला खूब देता है , कर लेना तू !मौज
क्यों ?ढूँढता है उसको बाहर ,तुझ में उसकी ओज
अंधियारे में भरपूर सोया उजियारे में भगता रोज़
मिट जाए मन का अंधियारा हट जाएगा दिल से बोझ
कण कण के भीतर वह रहता तू !उसकी है फौज
तीरथ मूरत में न मिलेगा ,क्यों करता है उसकी खौज ?
कर दे अर्पण सारा जीवन ,ज्यादा तू !न सोच
बन जाएगा जब तू !उसका ,ढोयेगा वह तेरा बोझ
पूरा होगा ख़्वाब सुनहरा ,कौशिशे करना तू !रोज
होगा कर्मो का अभिनन्दन ,खिलते है सरोवर में सरोज
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नापती खुद को नदी है
तय जो कर पाई समय को, खो गई कोई सदी है खोह, पर्वत, खाइयों से बहकर आई नदी है पत्थरों से जो संवरती, गीत में संगीत भरती, खोजती अपना धरातल, हौसलो...
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यह कैसा होता बंधन हैं ये होता कैसा नन्दन है ये भाव अनोखे भरे भरे ये रिश्ते होते खरे खरे शब्दों के मोती झरे झरे इन आँखो में अभिनन्दन है ...
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जिव्हा खोली कविता बोली कानो में मिश्री है घोली जीवन का सूनापन हरती भाव भरी शब्दो की टोली प्यार भरी भाषाए बोले जो भी मन...
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