अमृत बरसे नभ
शरद पूर्णिमा में पाया है
जीवन का सौरभ
ठंडी ठंडी पवन बही
ठंडे दिन और रात
खुशबू महके पंछी चहके
सुरभित पारिजात
बांसुरी की मीठी लहरी,
कान्हा करे पुकार
हिय में अंतर्नाद रहा
बजते रहे सितार
खुली नहीं खिड़की दरवाजे बन्द है जीवन में बाधाएं किसको पसन्द है कालिख पुते चेहरे हुए अब गहरे है गद्य हुए मुखरित छंदों पर प्रतिबंध है मिली...
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