मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

दिख रही कहीं आत्मा

खो  गए  तारे  वो  सारे 
खो  गया  कहीं  चंद्रमा 
दिख  रहे  सुन्दर  नज़ारे 
चोटियों  पर  हिम जमा

है प्रभा की रश्मियां  ये 
प्राची  से  है  झाँकती 
पंछीयो की  टोलियाँ  है 
दूर  गगन  को  नापती
जो  अमावस  कर  न  पाई 
कर  रही  वो  पूर्णिमा

जंगलों  में  अंचलों  में 
कुछ  हिरण  दल झूमते  
अब  कहीं  नवगीत  को  है 
मंत्रवत  वो  सुनते  
पेड़  पर्वत  खाइयों में 
दिख  रही  कोई  आत्मा 



है  यहां  कुछ  औस बूंदे 
 बादलों  से  वे  न  बरसे 
त्रस्त  होती  ये  धरा  है 
कंठ  तरसे  होंठ  तरसे 
दूर  गए  मौसम  यहां  से 
हो  गया  अब  खात्मा 





2 टिप्‍पणियां:

पर कुछ न कुछ तो लोच है

  अब  यहां  उत्तर  भटकते  और  खटकती सोच  है  पंख  फैले  पंछीयो  के   दिख  रही  यहां  चोंच  है  अब  हमें  परछाईयों   गहराइयों  को  जानना  है ...