जुगनू करते शोर रहे दीप से तम उज्ज्वल
दुख के साथी कहा गये सुख के साथी साथ
पीडायें दिन रात जगी होते छल और घात
अपनो का न साथ रहा अपनो का न बल
अपनो से ही हार गया डूबता अस्ताचल
सपने सारे ध्वस्त हुए कविता हो गई मौन
छल पाकर हम पस्त हुए दुख का साथी कौन
इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की अमर धरोहर मालवा की धरती केवल कृषि, व्यापार और वीरता की भूमि नहीं रही, बल्कि यह भारत की उन प्राचीन सा...
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