जुगनू करते शोर रहे दीप से तम उज्ज्वल
दुख के साथी कहा गये सुख के साथी साथ
पीडायें दिन रात जगी होते छल और घात
अपनो का न साथ रहा अपनो का न बल
अपनो से ही हार गया डूबता अस्ताचल
सपने सारे ध्वस्त हुए कविता हो गई मौन
छल पाकर हम पस्त हुए दुख का साथी कौन
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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