शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

जीवन जल की धारा सा

आसमान में तारा सा 
जीवन जल की धारा सा 

बहती हुई हवाये  है 
सुख दुःख इसमें पाये है 
हारा सा दुखियारा सा 
खट्टा मीठा खारा सा 

किस्मत किसने पाई है
 सुख सपने परछाई है 
सपना एक कुंवारा  सा 
जीवन दर्द दुलारा सा

जल निर्मल कोमल हो मन 
परिवर्तन जीवन का धन 
 सूरज के उजियारा सा 
जीवन  सबसे प्यारा सा


सोमवार, 29 दिसंबर 2014

उम्मीदे कुछ और है

मार्ग में संघर्ष है
 संघर्ष के कई दौर है 
संघर्ष में उत्कर्ष है 
उत्कर्ष का नहीं छोर है 
राह में कांटे बिछाये
 मुश्किलें कितनी भी आये 
मौत भी न जीत पाये 
उम्मीदे कुछ और है 

हर खुशी दुःख से बड़ी है
मुश्किलो से वह लड़ी है 
लौट आओ उम्मीदे तुम 
मंजिले चौखट खड़ी  है 
आज के भीतर रहा कल 
अंकुरित बीज फिर बना फल 
हर प्रतीक्षा है परीक्षा 
यहाँ परीक्षा की झड़ी  है

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

जन जन में खुशिया छाई है

लोक अदालत आई है ,जन जन में खुशिया छाई है 
कर लो बहना राजीनामा ,प्रेम सुधा सुख दाई है

सेवा ही संकल्प हमारा ,सेवा ही अभियान है 
न्याय दान ही महादान है निर्धन का सम्मान है 
न्याय शुल्क से पा लो मुक्ति, न्याय भागीरथी आई है 

मत भेदो  को दूर कर प्यारे ,नवयुग का आव्हान है 
प्री लिटिगेशन प्री बार्गेनिंग ,यह विधि का वरदान है 
विधि है मूर्ति विधि से पूर्ति ,हर मुश्किल हट पाई है

सोमवार, 3 नवंबर 2014

भाव के नहीं ईख है

जिंदगी है धार नदिया  है 
दर्द है तकलीफ है 
हार तो मिलती रही है 
जीत में कहा सीख है 
चाहतो के मिल रहे शव
,राहते  मिलती नहीं है 
प्यार की तुलसी है झुलसी 
नहीं वक्त की मिली भीख है

हर तरफ चिंगारियाँ है 
किलकारियाँ है चीख है 
प्यास ठहरी अधबुझी है
फिर मिली कालिख है
विष घोले  है सपोले  
होले  होले मन टटोले
नीम करेले है कसैले 
भाव के नहीं ईख है

शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

जीवन गीता श्लोक हो

घर आँगन में दीप  जला लो ,ह्रदय में आलोक हो 
उजियारे से प्रीत लगा लो ,मन  निर्भय अशोक हो 

जग जननी माँ दुर्गा लक्ष्मी ,देती यश धन बल है 
गुणों से पूजित हो जाते ,गुण  बिन सब निष्फल है
गुण  को पा लो स्वप्न सजा लो ,धरा स्वर्ग का लोक हो 

ज्योति से होता उजियारा, ज्योतिर्मय जगदीश है 
ज्योतिर्मय जग मग आशाये ,ज्योति का आशीष है 
चमक दमक दीपो की ज्योति ,जीवन गीता श्लोक हो

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

दीवाली के दीप जले है, दीपो का त्यौहार है

दीवाली के दीप  जले है, दीपो का त्यौहार है 
मिली रोशनी अंधियारे को ,खुशियो की बौछार है 

मिटटी से बन जाता सब कुछ, माटी करती  प्यार है 
मिटटी के दीपक कर देते ,धरती का श्रृंगार है 
मिटटी से ही शिल्प ढला  है ,शिल्पी का  औजार है 

गौरी की छम छम पायलिया , बैलो के बजते घुँघरू 
रंगो से सजती दीवारे ,मस्ती की डम डम  डमरू 
दीपक सा जग -मग हो तन मन रोशन हर दीवार है 

कर्मो का यह दीप  पर्व है, करम धरम का मर्म है 
शुभ कर्मों  का सुफल होगा ,नीच कर्म से शर्म है 
बिना कर्म के आज नहीं है ,सपने हो बेकार है

जीरन का किलेश्वर महादेव

इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की अमर धरोहर मालवा की धरती केवल कृषि, व्यापार और वीरता की भूमि नहीं रही, बल्कि यह भारत की उन प्राचीन सा...