होंठ जिसको गुनगुनाये
तो उसे हम गीत कहते
ये हृदय भूलने न पाए
तो उसे हम मीत कहते
जो पुरानी रुढियों को
पीढ़ियों से जी रही है
हम उसे हैं प्रीत कहते
तुम उसे है रीत कहतें
झर गई बारिश से कलियाँ पत्तिया बूँदों ने धोई है यहा अधरों पे खुशियां क्या कर गया श्रृंगार कोई डालियों पर फूल अटके शूल भी आँखों को खटके...