होंठ जिसको गुनगुनाये
तो उसे हम गीत कहते
ये हृदय भूलने न पाए
तो उसे हम मीत कहते
जो पुरानी रुढियों को
पीढ़ियों से जी रही है
हम उसे हैं प्रीत कहते
तुम उसे है रीत कहतें
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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