शनिवार, 24 मार्च 2012

गहन तिमिर निगलना होता है

दीपक बन जलने से अंधियारा जीवन का दूर होता है 
जला नहीं गला जो केवल पिघल कर चूर होता है 
औरो से क्या जलना है ,स्वयं में ही पिघलना है 
दीपक सम जल कर गहन तिमिर निगलना होता है  

इस्पाती इरादों के बल प्रतिपल  चलना होता है 
धधकते अंगारों के बीच लोहे सा ढलना होता है  
परस्पर विश्वास का सहारा न मिल पाए तो   
आत्मविश्वास के बलबूते जीवन भर चलना होता है 

सागर की गहराई में सपनो को नित मचलना होता है 
लहरों पर प्राणों लेकर  नैया को पल पल  चलना होता है  
 कौन कहता है उखड रही साँसों में संकल्प नहीं होता 
घने अंधेरो के भीतर से नित  नित निकलना होता है 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ईश्वर वह ओंकार

जिसने तिरस्कार सहा  किया है विष का पान  जीवन के कई अर्थ बुने  उसका  हो सम्मान कुदरत में है भेद नहीं  कुदरत में न छेद कुदरत देती रोज दया कुदर...