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कामनाएँ है विदेशी
जागती है ये सुबह सो गई है रात ऐसी पीठ पीछे दोगले है सामने बनते हितैषी हौसले अब थक चुके हैं स्वाद दुख के चख चुके है ...
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जिव्हा खोली कविता बोली कानो में मिश्री है घोली जीवन का सूनापन हरती भाव भरी शब्दो की टोली प्यार भरी भाषाए बोले जो भी मन...
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यह कैसा होता बंधन हैं ये होता कैसा नन्दन है ये भाव अनोखे भरे भरे ये रिश्ते होते खरे खरे शब्दों के मोती झरे झरे इन आँखो में अभिनन्दन है ...
ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर गीत ...
जवाब देंहटाएंउत्साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद
हटाएंबहुत बढ़िया
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