कर रहे श्रृंगार झरने
चल पड़े बादल यहा पे
सिंधु से जल को है भरने
न रही मासूम कलियां
जब रहा संसार छलिया
रह गई केवल घटाए
और सपने थे बिखरने
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 12 अगस्त 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
वाह
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