शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

शिव सतयुग निर्माण

चिंता चित से हटी रहे ,चित में हो भगवान 
विषपायी शिव पूज्य रहे ,कर शिव का गुणगान 

शिव पूजन है सहज सरल , शिव व्यापे अभिषेक 
शिव की शक्ति जानिये, शिव शक्ति है एक 

 सावन पावन  हरा भरा, बारिश की रिम झिम 
 शिव  जल  का अभियान है, शिव शंकर है हिम 

शिव जी सबके परम पिता ,हम बालक अनजान 
बालक सा मन  चाहिए चाहिये ,मासूम सी मुस्कान 

शिव व्रत और उपवास नहीं ,शिव है जग कल्याण 
शिव सज्जन के साथ रहे ,शिव सतयुग निर्माण 


गुरुवार, 17 जुलाई 2014

परमानंद

व्यक्ति प्रतीक हो या स्थान
 उसे पवित्र  बना दो पर 
इतना पवित्र बना भी मत दो कि
 उनसे  दुरी स्थापित हो जाए 
उनमे परायापन लगने  लगे
किसी व्यक्ति विशेष को 
इतना पूजनीय आदरणीय मत बना दो कि 
उससे हम अनुकरण न कर सके 
और हम उसे सिर्फ पूजते रहे 
स्वयं को इतना श्रेष्ठ मत मान लो 
कि  हम जन सामान्य से दूर हो जाए
ऐसी पवित्रता ऐसा पूज्य होना ऐसी श्रेष्ठता 
जो आराध्य को साधक से दूर कर दे 
और स्वयं को जन सामान्य को दूर
निरर्थक है मिथ्या है पाखण्ड से परिपूर्ण है 
हमें तो ऐसी सहजता चाहिए 
और ईष्ट में ऐसी सरलता चाहिए 
कि चहु और अनुभूति होती रहे ईष्ट कि
और हम डूब जाए परमानंद में

शनिवार, 21 जून 2014

बदले मन के भाव है

फूल बिखेरे गुलमोहर ने  , गर्म हो रही छाव है 
 ताप दे रही है दोपहरिया , भींग रहे सिर पाँव है 

रस्ते टेड़े  बदहाली के ,पथ पर उड़ती धूल  है 
मानसून में होती  देरी ,शायद हो गई भूल है
जल बिन जीवन कब होता है निर्जन होते गाँव है 

लौट रही न अब यह गर्मी ,सूखा थल से जल है
आज कटे है सुन्दर उपवन ,
नष्ट हो रहा कल है
हे ! बादल तुम क्यों है बदले? बदले मन के भाव है 

सूख गए है घट, तट, पनघट ,रिक्त हुए सब कुण्ड है 
जल बूंदो को तरसे खग दल ,भटक रहे चहु झुण्ड है 
कोयलिया फिर भी है बोली ,कौए  करते कांव  है

 
 
 




 

शुक्रवार, 20 जून 2014

पेड़ और पिता

पेड़ और पिता में क्या अंतर है ?
पेड़ भी पिता के समान छाया देता है 
पेड़ की टहनियों पर पंछी आकर थकान मिटाते है 
पिता के पास पुत्र आश्रय पाकर  अरमान सजाते है 
सरंक्षण पाकर अभय दान पाते है 
पेड़ की जड़े  बहुत गहरी होती है 
पिता की सोच अनुभव से भरी होती है 
पेड़ से पंछी और मानव मीठे फल पाते है 
गिरने वाली लकडियो से हम भोजन पकाते है 
पेड़ की छाया  देखते ही आशाये जग मगाती है 
पसीने से लथ -पथ नाजुक सी देह राहत पाती है 
इसलिए पिता भी पेड़ के बीच कोई अंतर नहीं है 
पेड़ और पिता दोनों हमारे पूज्य है 
फिर भी हम दोनों के अस्तित्व को मिटाने पर क्यों तुले है 
हुई ढीली  संस्कारो की जड़े और वृध्दाश्रम क्यों खुले है 

रविवार, 11 मई 2014

समझो वह प्यारी माता है

करुणा दीपक है द्वार धरा 
ज़ीवन मे जिसके प्यार भरा 
हम जिसे देख कर हर्षाये 
इस जग का सारा सुख पाये 
प्यारा से जिससे नाता है
 समझो वह प्यारी माता है 

तन मन का जिससे बन्धन है 
चरणोँ की  रज मे चन्दन है 
बेटे का मन जो पढ़ पाई 
वह कठिन वक्त से लड़ आई 
दिल  दर्द उसी  का पाता है 
समझो वह प्यारी माता है 

खुशिया आँखों मे छलकाए 
दुख देखे आँसु बरसाए 
मन जिसके प्यार मे पागल है 
जीवन मे पाया सम्बल है 
गीत उसके ही गुण गाता है 
समझो वह प्यारी माता है 

हम  हँस कर खेले बड़े हुये
मिटटी मे लथ-पथ खड़े हुये
आँचल से ममता बरसाए
होकर वत्सल माँ बहलाये
नटखट बचपन इतराता है
समझो वह प्यारी माता है 


मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

जो नजदीक है दूर हुए ,दूर रहते वो पास

रिश्तो का इतिहास रहा ,रिश्तो का  भू -गोल 
रिश्ते लाते प्रीत रहे ,रिश्ते मीठे बोल 

रिश्तो की  है  रीत रही ,रिश्तो के रिवाज 
रिश्ते नाते टूट रहे ,निकली न आवाज 

भावो से जो  रिक्त रहा रिश्तो से अनजान 
रिश्तो की गहराई को ,मानव  तू पहचान 

खूशबू से भरपूर रहा ,रिश्तों का अहसास 
जो नजदीक है दूर हुए ,दूर रहते वो पास 

रिश्तो से कुछ आस रही , मन  लगती है  ठेस 
अपनो से तो पीर मिली , प्रीत मिली  परदेस

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

संतुष्टि तो मन की अवस्था है

संतुष्टि का कोई पैमाना नहीं होता
कोई व्यक्ति एक बूँद पाकर संतुष्ट हो सकता है
कोई व्यक्ति समुन्दर पाकर संतुष्ट नहीं होता
संतुष्टि तो मन की अवस्था है
असंतोष की कोई सीमा नहीं होती
असंतुष्ट व्यक्ति को जितना मिल जाय कम है
असंतुष्ट व्यक्ति को संतुष्ट करना 
बहुत मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है
असंतुष्ट व्यक्ति का साथ होता बहुत दुखदायी है
संतोषी व्यक्ति ने सदा ही खुशिया बरसाई है
संतुष्ट वह व्यक्ति है जो भीतर जो संत है
भीतर की सत्ता की संतुष्टि का स्तर अनंत है
संतुष्ट मीरा थी 
जिसने गरल को पीया तो अमृत पाया है
संतुष्ट संत रसखान थे 
जिन्होंने धर्म को पूजा नहीं जिया है
इसलिए  सदा संतुष्ट रहो
असंतुष्ट रह कर कभी नहीं निकृष्ट और दुष्ट रहो

अर्चना संगीत लय में

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