शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

इंसाफ होगा

इन्हीं गर्मियों में है 
नगर साफ होगा 
बिजली का बिल भी 
यहां हाफ होगा 
दिए है सभी को 
चुनावी है वादे
टूटे कुछ घरों से 
इंसाफ होगा



रुकी न जरा सी



किस्मत रही बस उसकी ही दासी 
चली जो निरंतर शिखर की है प्यासी
उगी जो पूरब से ढली शाम जैसी 
जो ठहरी नहीं है रुकी न जरा सी

मां ने दिए है बेटों को निवाले
मां की है गोदी जगत जो सम्हाले
विपदाये जितनी रही हो मगर वह
 बच्चों को पाले और विपदाये टाले 

जले हम हवन से


भरा है समंदर 
भरी हुईं आँखें 
टूटे हुए पर्वत 
कटी हुई शाखें 
किसी ने न समझी 
दुखी मन की पीड़ा
लगी हुई बेड़ी 
डली है सलाखें 

रहे हम धरा पे 
जुड़े हम गगन से
ऊंचे हो इरादे 
उड़े हम पवन से
चले जब भी पथ पर
 हो जाए लथपथ 
जले दीप शिखा से 
जले हम हवन से

रहा वही इन्सान 
जिसने विश्वास पाया
भागीरथ बना और 
गंगा है लाया
पत्थर को बिन कर 
बनाए शिवाले
पत्थर और कंकर में 
 ईश्वर जगाया



नवल गीत गया

नहीं जिसने जीवन में
 मधुमास पाया
गहन वेदना का नवल 
गीत गया
मिले जिसको रिश्ते 
कटीले नुकीले
हुए हाथ चोटिल
हुई जीर्ण काया

धरा है प्रफुल्लित
 है उन्मुक्त गगन 
 इधर उड़ते पंछी 
 उधर रहते मगन 
पवन बहती ताजी
 थोड़ा मुस्करा लो
सूरज दे रहा है 
जीवन को है अगन

धरा जिसने पाई 
उसका आकाश अपना 
मगर घर का मिलना 
केवल एक सपना
सपनों में बीता 
 बचपन और यौवन
मिली न विरासत 
अब तो जीवन में तपना



शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

समंदर

समंदर के अन्दर है
 कितने शिवाले
रहे रत्न सारे 
है उसने सम्हाले
समन्दर से अमृत
 समंदर बनो तुम
है अपने भीतर यह  
कई राज पाले 

समंदर में नदिया 
समंदर में सदिया
समंदर में पाई  है 
सुन्दर सी बगिया
कही इसके भीतर 
है हालात बदतर
है इसमें समाई
 जीवन की बतिया

दुखी है समंदर
 दुखी है किनारा
दुखी हुई धरती 
और जंगल सारा
दुखी हो के बादल 
बरसाता है जल 
दुखी ही बना है
 दुखी का सहारा

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

क्षितिज के किनारे

यही बहती नदिया
 किनारे बहे है 
ढहते हुए पर्वत
 ऊंचे किले ढहे है
भले छू लो ऊंचा
 आकाश कितना
क्षितिज किनारे 
रहे अनछुए है

समुंदर असीम है 
क्षितिज उसका कोना
रखो धैर्य अपना 
 होगा जीवन सलोना
रहे हर किनारे पे 
मगरमच्छ सारे
अगर कोई डराए 
मगर तुम डरो ना

है जितने भी तारे 
जमीन पे सारे
जमीन पे है नभ से
 किसी ने उतारे
 नदिया है झीलमिल
  झीलमिल किनारे
क्षितिज से है जल पर
 दिखे है नजारे

जरा सी गली है
 गली में है नारा
चुनावी क्षणों में 
चढ़ा हुआ पारा
जीता जैसे नेता
 हुआ ऐसे ओझल
मिला है वहीं तो 
नेता जो है हारा 

समंदर में नदिया
 नदिया में नाले
सरोवर धरोहर
 कुएं जल के प्याले
नहरों से कितनी 
सूख गई नदिया
शहरों की खुशियों से
 दुखी गांव वाले

खाली मन की बगिया 
खाली हुई थाली
चुभे जैसे नश्तर सी 
उनकी है गाली
पड़ी नहीं दृष्टि 
तरसते जीवन पर
नहीं अब फूलों को 
मिलता है माली



घनीभूत पीड़ा के दरिया बहे है

अंधेरों के भीतर 
उजाले रहे है
घनीभूत पीड़ा के
 दरिया बहे है
ये कैसा मुकद्दर 
जहां है समन्दर 
ख्यालों में खारे 
अनुभव रहे है

जरा पूर्व जन्मों का 
कही पाप धो लू 
लिखूं आत्म कथा 
और भेद खोलूं
कही यादें पनघट
कही यादें मरघट
जो थोड़ा सकून हो तो 
जीवन को है जी लू

ये सारी है दुनिया 
क्या तुम जीत लोगे
जितना भी दम होगा 
तुम उतने चलोगे
यदि है इरादे 
बड़े रहे मकसद
तो स्वर्णिम शिखर को
 तुम चूम लोगे

कही बंद पट है
 कही बंद तट है
कही गंगा जमुना
 किनारों पे वट है
कही कुंभ में जाने
 आने के लिए
 कही भीड़ उमड़ी 
कही सन्त मठ है

कही आते जाते हुए
रस्ता है देखे
वे घूर घूर कर
कही आंख सेके 
खड़े हुए मजनू
 चौराहों पर है
बने हुए रहवर
कही जाल फेंके

ज़िंदगी का कल रही

थोडी थोड़ी गल रही है   थोड़ी थोड़ी जल रही है  है पुरानी वेदनाये   गीत में जो ढल रही है  जो हमारे हित में थीं  जो तुम्हारी...