शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

रुकी न जरा सी



किस्मत रही बस उसकी ही दासी 
चली जो निरंतर शिखर की है प्यासी
उगी जो पूरब से ढली शाम जैसी 
जो ठहरी नहीं है रुकी न जरा सी

मां ने दिए है बेटों को निवाले
मां की है गोदी जगत जो सम्हाले
विपदाये जितनी रही हो मगर वह
 बच्चों को पाले और विपदाये टाले 

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