ओ जीवन वस्तुत तुम क्या हो
अपने स्वरूप का परिचय बता दो
यह तो सुनिश्चित की तुम वह नहीं हो
जिसे कहते है हम दुखियारे पुष्पों की लता
प्रभाती पवन का सुखद स्पर्श
पुलकित हुआ मन छाया है हर्ष
जीवन की मधुरता क्या तुम यही हो
जो साँसों में समाकर नसों में बही हो
ओ जिंदगी क्या तुम यही हो
औस की जो बूंदे खिली हुई थी दूब पर
सुखद और शीतल अनुभूति तुम्ही हो
प्रफुल्लित फूलो के सुगंध की तरह से
उपवन से बहकर शहद में रही हो
ओ जिंदगी शायद तुम यही हो
भवरोंकी उमंगो से हम तो अपरिचित
जीवन का कुसुम फिर कैसे हो सुरभित
तूफान की तरंगो से नैया है पीड़ित
सृजन की लहर भी कभी तुम रहे हो
ओ जिंदगी वास्तव में तुम यही हो
सृजन की पूजन के जो स्नेही बने हो
रविवार, 24 अप्रैल 2011
सोमवार, 21 मार्च 2011
preetii
ख़ूबसूरत आत्मा है खूबसूरत शरीर
प्रियतमा के मिलन को मन रखना धीर
कान्हा बासुरी बजे यमुना के तीर
तुम्ही मेरी राधा हो तुम्ही मेरी हीर
भर आये आँखों में यादो के नीर
विरह की है टीस ऐसी नित उठती पीर
ये दूरिया कम कर दो मेरे जगदीश
प्रियतमा में बसती है मेरी तकदीर
प्यार ही पूजा है प्रियतम मंदिर
मरुथल के जल जैसा ममता का नीर
चारो और घिर आया ईर्ष्या तिमिर
प्रीती का दीप ऐसा उसको दे चीर
भक्तो के ह्रदय में रहते रघुवीर
प्रियतमा के चितवन में प्रिय की तस्वीर
है प्रश्न खड़े जीवन में कितने गंभीर है
कृष्ण खड़े मधुवन में गोपियों से घिर
प्रियतमा के मिलन को मन रखना धीर
कान्हा बासुरी बजे यमुना के तीर
तुम्ही मेरी राधा हो तुम्ही मेरी हीर
भर आये आँखों में यादो के नीर
विरह की है टीस ऐसी नित उठती पीर
ये दूरिया कम कर दो मेरे जगदीश
प्रियतमा में बसती है मेरी तकदीर
प्यार ही पूजा है प्रियतम मंदिर
मरुथल के जल जैसा ममता का नीर
चारो और घिर आया ईर्ष्या तिमिर
प्रीती का दीप ऐसा उसको दे चीर
भक्तो के ह्रदय में रहते रघुवीर
प्रियतमा के चितवन में प्रिय की तस्वीर
है प्रश्न खड़े जीवन में कितने गंभीर है
कृष्ण खड़े मधुवन में गोपियों से घिर
मंगलवार, 15 मार्च 2011
himaalayi vaade iraado ke liye
बसे घर को सदा से सजाते रहे है
नंदन उपवन में बगिया लगाते रहे है
अंधरे में दीपक जला नहीं पाए
उजाले में सूरज उगाते रहे है
निर्झर का पतन गुगुनाते रहे है
मरुथल को तरसना सिखाते रहे है
उगते अंकुर को जल पिला नहीं पाए
गहरे सिंधु में सरिता बहाते रहे है
नयन में समंदर बसाए हुए है
अगन को ह्रदय में समाये हुए है
हिमालयी वादे इरादों के लिए
श्रम सीकर की सरिता बहाए हुए
नंदन उपवन में बगिया लगाते रहे है
अंधरे में दीपक जला नहीं पाए
उजाले में सूरज उगाते रहे है
निर्झर का पतन गुगुनाते रहे है
मरुथल को तरसना सिखाते रहे है
उगते अंकुर को जल पिला नहीं पाए
गहरे सिंधु में सरिता बहाते रहे है
नयन में समंदर बसाए हुए है
अगन को ह्रदय में समाये हुए है
हिमालयी वादे इरादों के लिए
श्रम सीकर की सरिता बहाए हुए
सोमवार, 14 मार्च 2011
sham
कंचन सी कौंधी है सुनहरी शाम
रश्मी के होठो पर रत्नों के नाम
सरोवर के दर्पण में झांके गगन
सुगन्धित फूलो से महके पवन
चिडियों के कलरव में सरगमी गान
भंवरो की गुंजन ने छेड़ी है तान
मौजो से तीरों पर नौकाये आई
ह्रदय की हल चल ने बनायीं रुबाई
गायो के बछड़ो ने तृप्ति बुझाई
हो गए जीवंत डगर गली ग्राम
लहरों से उठती है शीतल समीर
, झील मिलाई मुस्काई सरिता गंभीर
प्रियतमा संध्या है प्रेमी गुमनाम
शर्मा कर चुप जाती निशा को थाम
रश्मी के होठो पर रत्नों के नाम
सरोवर के दर्पण में झांके गगन
सुगन्धित फूलो से महके पवन
चिडियों के कलरव में सरगमी गान
भंवरो की गुंजन ने छेड़ी है तान
मौजो से तीरों पर नौकाये आई
ह्रदय की हल चल ने बनायीं रुबाई
गायो के बछड़ो ने तृप्ति बुझाई
हो गए जीवंत डगर गली ग्राम
लहरों से उठती है शीतल समीर
, झील मिलाई मुस्काई सरिता गंभीर
प्रियतमा संध्या है प्रेमी गुमनाम
शर्मा कर चुप जाती निशा को थाम
शनिवार, 26 फ़रवरी 2011
bhul gayaa
आंसुओ से भरी रह गयी गगरी
सूनी ही रही प्यार की नगरी
धीरज भी इम्तिहान देते देते टूट गया
संघर्षो का प्रियतम
ओ पुरुषार्थी यौवन
तू कहा पर खो गया
जीवन का रस लुट गया
मन की भाषा जाने कौन
संवेदनाये बहरी
प्रीत गीत हो गए मौन
चोटे भी खायी गहरी
भावो की गहराईया
प्यार की परछाईया
दर्द की रुबाईया
भूल गया रे भूल गया
याद थी जो भूल गया
सूनी ही रही प्यार की नगरी
धीरज भी इम्तिहान देते देते टूट गया
संघर्षो का प्रियतम
ओ पुरुषार्थी यौवन
तू कहा पर खो गया
जीवन का रस लुट गया
मन की भाषा जाने कौन
संवेदनाये बहरी
प्रीत गीत हो गए मौन
चोटे भी खायी गहरी
भावो की गहराईया
प्यार की परछाईया
दर्द की रुबाईया
भूल गया रे भूल गया
याद थी जो भूल गया
शनिवार, 12 फ़रवरी 2011
दे न सके संदेश सही
व्यतीत अतीत के इतिहासों का,
किंचित भी आभास नहीं
भावी कल के विश्वासों का ,
कुछ भी तो आधार नहीं
देख पाए न नियति न्याय,
खड़े यहा हम तो निरुपाय
उलझी सी मंजिल लगाती है,
पर गति को विराम नहीं
बढे कदम तो कुछ भी पाए ,
पड़े रहे रहे तो शून्य मही
आदर्शो की लिए विरासत ,
पर वैसा आचार नहीं
कथित भद्रजन पीकर हाला,
फेर रहे मूल्यों की माला
नित्य नवीन अभिनय दिखला कर ,
दे न सके सन्देश सही
किंचित भी आभास नहीं
भावी कल के विश्वासों का ,
कुछ भी तो आधार नहीं
देख पाए न नियति न्याय,
खड़े यहा हम तो निरुपाय
उलझी सी मंजिल लगाती है,
पर गति को विराम नहीं
बढे कदम तो कुछ भी पाए ,
पड़े रहे रहे तो शून्य मही
आदर्शो की लिए विरासत ,
पर वैसा आचार नहीं
कथित भद्रजन पीकर हाला,
फेर रहे मूल्यों की माला
नित्य नवीन अभिनय दिखला कर ,
दे न सके सन्देश सही
गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011
सृजन
जो सृजन यहाँ सतत चलता
वह सहज उन्मुक्त बनता
सततता कैसे बनाए
वक्त ने यहाँ जुल्म ढाए
जलधारा की प्रबलता में
भंवर गहराते ही जाए
यथार्थिक भंवरो की सघनता
उन्मुक्त भावो को दबाये
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वो नदी है
नापती खुद को नदी हैं सौपती खुद को सदी है टिमटिमाती रोशनी सी झोंपड़ी से वो बँधी हैं मन को भायी वो सुहाई वो है नेकी न बदी है दिन होती रात ह...
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यह कैसा होता बंधन हैं ये होता कैसा नन्दन है ये भाव अनोखे भरे भरे ये रिश्ते होते खरे खरे शब्दों के मोती झरे झरे इन आँखो में अभिनन्दन है ...
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जिव्हा खोली कविता बोली कानो में मिश्री है घोली जीवन का सूनापन हरती भाव भरी शब्दो की टोली प्यार भरी भाषाए बोले जो भी मन...
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यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है अनुभव से सब कुछ पाया है अनुभूति जितनी गहरी हो ठहरी उतनी ही काया है जब घना अँधेरा छाता है चिंतन ...





