सोमवार, 26 दिसंबर 2011

ह्रदय मे उल्लास भर कर,राह करना पार

जिन्दगी के पथ पर मत मान लेना हार
ह्रदय मे उल्लास भर कर,राह करना पार

दूर कर दिल कि टूटन को छोड दे मन की घुटन को
सामने मंजिल खडी है कर रही सत्कार

आदते  जो भी बुरी है छल कपट की वे धुरी है
आचरण अपना बदल दे है सत्य निर्विकार

सोच का विस्तार ही तो हर स्वप्न का आधार
श्रम देता है सदा ही हर सोच को आकार

हो रहा मानस दूषित ,भावनाये है  कलुषित
सच्चाई कि ताकत बनी है आज की तलवार

हर चूभन और घाव पर ही पड रहे है वार
भेद क्यो तू खोले मन का हर तरफ गद्दार





कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ईश्वर वह ओंकार

जिसने तिरस्कार सहा  किया है विष का पान  जीवन के कई अर्थ बुने  उसका  हो सम्मान कुदरत में है भेद नहीं  कुदरत में न छेद कुदरत देती रोज दया कुदर...