शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

प्रीत और सौंदर्य पर थे वे लगाते बोलीया 
सामने संवेदना के शत्रुओ की टोलिया 
असहाय हो गए थे छल धन बल के समक्ष 
प्रीत के क्या ? प्राण लेगी ये रिवॉल्वर गोलिया 

धन की चाह में फैलाई याचको ने झोलिया 
मन की आहों  ने उठाई अर्थिया और डोलिया 
भीड़ में ही खो गई थी आत्मीयता कही 
अपने लोगो ने जलाई अरमानो की होलिया 

आकाश के उस छोर से है उठती आशा किरण 
हुई आग सी  संकल्पना  बढ़ते  गए उसके चरण 
वह तोड़ती है वर्जना चित्रित हुई हर सर्जना 
लो आ  गई तम  चीरकर हुआ चेतना का संचरण 
 



 

1 टिप्पणी:

पर कुछ न कुछ तो लोच है

अब  यहां  उत्तर  भटकते   और  खटकती सोच  है  पंख  फैले  पंछीयो  के   दिख  रही  यहां  चोंच  है  अब  हमें  परछाईयों   गहराइयों  को  जानना  है  ...